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मध्यप्रदेश / 22 दिन बचे चुनाव के, 4 दिन त्योहार और प्रक्रिया में निकलेंगे, 18 दिन में प्रत्याशी को मिलना होगा ढाई से साढ़े 3 लाख मतदाताओं से

Dainik Bhaskar

Nov 09, 2018, 04:51 PM IST


candidate will have to meet from 2.5 to 3.5 lakh voters
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candidate will have to meet from 2.5 to 3.5 lakh voters

  • क्षेत्र 1, 2 व 5 के प्रत्याशी को हर दिन 19 हजार मतदाताओं तक पहुंचना होगा
     

हरिनारायण शर्मा, इंदौर . 28 नवंबर को इंदौर सहित प्रदेश में विधानसभा चुनाव का मतदान होगा। मतदान में 22 दिन बचे हैं। इसमें से एक दिन दिवाली, एक दिन छोटी दिवाली (देव उठनी एकादशी), एक दिन नामांकन का और एक दिन पहले चुनाव प्रचार खत्म हो जाएगा। यानी उम्मीदवारों के पास प्रचार के लिए 18 दिन बचेंगे।

 

इंदौर की 9 में से 3 सीटें ऐसी हैं, जहां 3.28 लाख से 3.67 लाख मतदाता हैं। इन बड़े विधानसभा क्षेत्रों में 1, 2 और 5 शामिल है। इन क्षेत्रों में 18 दिन में प्रत्याशी को 12 से 15 वार्ड के साढ़े 3 लाख से ज्यादा मतदाताओं के बीच जाना है। यानी हर दिन प्रत्याशी को 19 हजार मतदाताओं से मिलना होगा। प्रत्याशी हर दिन 12 घंटे भी प्रचार करता है तो उसे हर घंटे 1620 लोगों से वोटों की गुहार करनी है। यह सब भी तब हो पाता जब 5 नवंबर तक सभी टिकट फाइनल हो जाते। 
इंदौर की 9 सीट पर भाजपा फिलहाल एक भी प्रत्याशी घोषित नहीं कर पाई है वहीं कांग्रेस ने भी चार प्रत्याशी ही घोषित किए हैं। आम मतदाता में यही चर्चा है कि आखिर इंदौर में ऐसा क्या है जो टिकट समय पर तय नहीं होते। कांग्रेस और भाजपा के ही सूत्रों की मानें तो पहली सूची दोनों ही पार्टियों ने जो जारी की, उससे सराहा गया। बाद में शुरू हुआ बंटवारे का खेल। इसी कारण देरी भी हो रही है। हर नेता समर्थक को ज्यादा आंकता है।

 

भाजपा में ऐसा क्यों : महाजन-विजयवर्गीय के अलावा भी यहां हस्तक्षेप कम नहीं ? 
इंदौर की राजनीति में जितना दखल लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन का है, उतना ही राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय का। शिवराज के सपनों के शहर में उनकी अपनी अलग भागीदारी और हस्तक्षेप है। इसके अलावा नरेंद्र सिंह तोमर, प्रभात झा, विनय सहस्त्रबुद्धे और खुद प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह की पसंद। इन सबके बाद व्यक्तिगत पैरवी करने वाले नेता भी हैं। गोपी नेमा सुषमा समर्थक तो उषा ठाकुर पिछली बार सीधे राजनाथ सिंह के कोटे से टिकट लाई थीं। इसी कारण बात बनते-बनते बिगड़ जाती है। इन सबसे परे संघ और संगठन भी अब गौण हो गया है। यही कारण देरी का भी है।

 

कांग्रेस में ऐसा क्यों : यहां परंपरा ही बन गई, नाम वापसी पर मिलता है बी-फॉर्म
कांग्रेस में कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया की आपसी मशक्कत जगजाहिर है। इसके बाद अरुण यादव, भूरिया, विजय लक्ष्मी साधौ, सुरेश पचौरी, अजय सिंह जैसे क्षेत्रीय नेताओं की भी अपनी पसंद। पिछली बार क्षेत्र 1 से दीपू यादव ने राजस्थान के अलवर से जीतेंद्र सिंह के दम पर टिकट लाकर चौंका दिया था। वह भी घोषित टिकट कटवाकर। इसी तरह इंदौर-2 में भी इसी मशक्कत में मोहन सेंगर का टिकट काटकर छोटू शुक्ला को दिया था। इसी तरह प्रदेश प्रभारी, राष्ट्रीय मोर्चों के अध्यक्ष और अन्य पदाधिकारियों के दम पर भी टिकट इंदौर आते रहे हैं।  

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