लोकसभा चुनाव / 35 साल से एससी सीटों पर कांग्रेस को मौके की तलाश

Dainik Bhaskar

Apr 16, 2019, 11:16 AM IST



Congress seeks spot on SC seats for 35 years
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Congress seeks spot on SC seats for 35 years
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  • प्रदेश में अनुसूचित जाति के लिए चार लोकसभा सीटें आरक्षित, 1984 के बाद से अब तक सिर्फ दो बार 1991 और 2009 में कांग्रेस दो-दो सीटें ही जीत पाई

सुधीर निगम, भोपाल . मध्यप्रदेश में अनुसूचित जाति (एससी) के लिए भिंड, टीकमगढ़, देवास और उज्जैन लोकसभा सीट आरक्षित है। इन सभी पर 1984 के बाद से कांग्रेस का प्रदर्शन खराब रहा है। इन 35 साल में कांग्रेस 1991 और 2009 में सिर्फ दो-दो सीटें ही जीत पाई।

 

अभी चारों सीटों पर भाजपा का कब्जा है। उज्जैन 1967 से ही आरक्षित है। 2009 में परिसीमन के बाद भिंड, टीकमगढ़ और देवास एससी के लिए सुरक्षित की गईं। इससे पहले उज्जैन के साथ मुरैना, सागर और शाजापुर सीट इस वर्ग के लिए रिजर्व थीं। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए चुनाव में ये सभी सीटें कांग्रेस ने जीती थीं। इसके बाद 1991 में मुरैना व सागर और 2009 में देवास व उज्जैन सीट ही कांग्रेस जीत पाई। इसके अलावा पिछले आठ चुनावों में उसे यहां किसी सीट पर सफलता नहीं मिली। इस बार इन सीटों पर भाजपा को कांग्रेस से कड़ी टक्कर मिलने की संभावना है।

 

फ्लैश बैक....1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद चारों सीटें कांग्रेस ने जीती थीं, उसके बाद यहां भाजपा की ताकत बढ़ी

 

भिंड :  यहां से भाजपा ने सांसद भागीरथ प्रसाद की जगह संध्या राय को उतारा है। संध्या के सामने कांग्रेस से देवाशीष जरारिया हैं। इस रिजर्व सीट पर ब्राह्मण और ठाकुर वोट ज्यादा है। भाजपा ने इसे ध्यान में रखकर संध्या को टिकट दिया। जरारिया बसपा से कांग्रेस में आए हैं। चर्चा है कि उन्होंने पिछले साल 2 अप्रैल को दलित आंदोलन में जो भाषण दिया था, उससे सवर्ण वर्ग की नाराजगी सामने आई थी। 2004 तक मुरैना सीट आरक्षित थी। यहां कांग्रेस आखिरी बार 1991 में जीती थी। इसके बाद लगातार पांच बार जीतकर अशोक अर्गल ने इसे भाजपा का गढ़ बना दिया।

 

टीकमगढ़ :  यहां वर्तमान सांसद वीरेंद्र कुमार के सामने कांग्रेस की किरण अहिरवार हैं। किरण पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह से जुड़े रहे एक पूर्व नौकरशाह की बेटी हंै। 2004 तक सागर सीट सुरक्षित थी। 2009 में टीकमगढ़ आरक्षित हुई और सागर सामान्य। वीरेंद्र ने इन सीटों पर पांच बार भाजपा को जीत दिलाई। सागर में कांग्रेस ने 1991 में अंतिम बार जीत का स्वाद चखा था।  

 

देवास :  भाजपा ने न्यायिक सेवा छोड़कर आए महेंद्र सोलंकी पर दांव खेला है। उनके सामने प्रसिद्ध कबीर गायक पद्मश्री प्रह्लाद टिपाणिया कांग्रेस प्रत्याशी हैं। 2009 में यहां से कांग्रेस के सज्जन सिंह वर्मा विजयी हुए थे। इससे पहले ये शाजापुर सीट थी, जहां से थावरचंद गेहलोत लगातार चार बार जीते थे। उसके पहले 1984 को छोड़कर भाजपा के फूलचंद वर्मा चार बार यहां से जीते।

 

उज्जैन : यह सीट भाजपा या जनसंघ का गढ़ रही। वरिष्ठ नेता सत्यनारायण जटिया यहां से सात बार जीते। अभी चिंतामणि मालवीय सांसद हैं। इस बार भाजपा ने उनका टिकट काट कर अनिल फिरोजिया को उतारा है। सामने कांग्रेस के बाबूलाल मालवीय हैं। विधानसभा चुनाव में यहां की आठ सीटों में से पांच कांग्रेस ने जीतीं। मालवीय बलाई समाज से हैं, जिसका अच्छा खासा वोट बैंक इस सीट पर है। 1984 में सत्यनारायण पंवार के बाद 2009 में कांग्रेस के प्रेमचंद गुड्‌डू ही यहां भाजपा का तिलिस्म तोड़ पाए। 1967 में रिजर्व होने के बाद इस सीट पर कांग्रेस को हमेशा हताशा हाथ लगी है।

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