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लोकरंजक तत्वों से सरस बनता मंद से महाकवि बनने की यात्रा बताता नाटक

एक अनुपम कवि, उसकी अनुपम उपमाएं और प्रतीक विराट प्रकृति का सुंदरतम कल्पनाशील वर्णन और उदात्त प्रेम का उतना ही...

Danik Bhaskar | Sep 12, 2018, 03:45 AM IST
एक अनुपम कवि, उसकी अनुपम उपमाएं और प्रतीक विराट प्रकृति का सुंदरतम कल्पनाशील वर्णन और उदात्त प्रेम का उतना ही अनुपम शृंगारिक चित्रण। यानी महाकवि कालिदास। ऋतु संहार हो या मेघदूतम्, कुमार संभवम् हो या अभिज्ञान शाकुंतलम् कुमार संभवम् हो या रघुवंशम्, मालविग्निमित्रम् , वे अपनी अद्रुभत काव्य प्रतिभा के कारण प्रसिद्ध हुए। इसी महाकवि पर संस्कृत नाटक महोत्सव के दूसरे दिन मंगलवार को रवीन्द्र नाट्यगृह में कालिदासचरितम् नाटक मंचित किया गया। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से इस नाटक में अधिकतम लोगों से अधिकतम तादात्म्य स्थापित करने की सहजता, सरलता और सरसता थी। यह इसलिए संभव हो सका क्योंकि यह नाटक निर्देशकीय प्रतिभा के कारण लोकरंजक तत्वों का संवेदनशील उपयोग करता है और भाषा की समस्या से परे एक दर्शनीय और सरस रंगमंचीय भाषा के जरिए दर्शकों को प्रभावित करता है। कालिदास संस्कृत अकादमी उज्जैन ने इसे सतीश दवे के निर्देशन में मंचित किया। सोमवार के मुकाबले दर्शकों की संख्या मंगलवार को दो गुना थी।

लोकसंगीत के मधुर तत्वों का इस्तेमाल

डॉ. भगवतीलाल राजपुरोहित विरचित नाटक का कथ्य इतना भर है कि विद्योत्तमा सहेलियों के साथ वररुचि के साथ मज़ाक करती है जिससे क्रोधित होकर मूर्ख मंद को ढूंढकर विद्योत्तमा का उससे विवाह करा देते हैं। जब विद्योत्तमा को यह पता चलता है वह मंद का अपमान करती है। इसी से क्रोधित होकर मंद मां काली की आराधना करते हैं और कण्वऋषि से शिक्षा लेकर कालिदास बन जाते हैं। तक्षशिला में महाराज अग्निमित्र की सहृदयता से प्रभावित होकर वह नाटक लिखता और कवि बन जाता है। उज्जयिनी लौटने पर महाराज विक्रमादित्य उसे विश्वकवि की घोषित करते हैं। लेकिन सतीश दवे इसे बहुत ही संवेदनशील प्रकाश योजना, सुंदर और वेशभूषा, लोकसंगीत के मधुर तत्वों का गीतों में इस्तेमाल करते और आकर्षक नृत्य संरचनाओं से नाटक को सहज-सरस बनाते हैं। इस नाटक में मालविग्निमित्रम् और मेघदूतम के संदर्भ के साथ यह नाटक कालिदास की काव्यप्रतिभा दर्शाता है। स्निग्ध हास्य बोध, साफ-सुथरी दृश्य योजना इसे नई आभा देते हैं।

अभिनय का मधुर कोरस

अभिनय के स्तर पर इस नाटक की यह खूबी थी कि यह अभिनय एक ऐसा मधुर कोरस बनाता है जिसमें केंद्रीय भाव को अभिव्यक्त करने का सामूहिक रचनात्मक प्रय| गूंजता है। यही कारण है कि कोई भी किरदार प्रमुखता के बजाय नाटक को प्रमुखता से अभिव्यक्त करता है। इसके 20 कलाकार 50 से ज्यादा चरित्रों को निभाते हैं। लेकिन कालिदास बने हर्षित शर्मा, राजा विक्रमादित्य बने शिरीष सत्यप्रेमी, अग्निमित्र बने जितेंद्र सिसौदिया, विद्योत्तमा बनी माया शर्मा ने सहज अभिनय किया। कुलदीप दुबे का संगीत और शुभम सत्यप्रेमी, राजू खान और जितेंद्र सिसौदिया का वस्त्र विन्यास आकर्षक था। कुछ जगह संवाद भूलने जैसी त्रुटियों को छोड़ दिया जाए तो नाटक प्रभावी था। नाट्य महोत्सव में बुधवार को डॉ. राधावल्लभ त्रिपाटी विरचित नाटक धीवरशाकुंतलम् मंचित किया जाएगा।