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235 भ्रष्ट अफसर-कर्मचारियों के खिलाफ चालान पेश करने सरकार नहीं दे रही मंजूरी

अकेले सरकार के विधि और विधायी कार्य विभाग के पास 190 से ज्यादा भ्रष्टाचार से जुड़े मामले अभियोजन स्वीकृति के लिए लंबित है

Dainik Bhaskar

May 02, 2018, 05:53 AM IST
Government not giving approval to launch challan against corrupt officials

इंदौर. सरकार भले ही भ्रष्टाचार के मामले में जीरो टॉलरेंस की बात करती हो, लेकिन लोकायुक्त में दर्ज 235 मामले सरकार से अभियोजन स्वीकृति नहीं मिलने के कारण आगे नहीं बढ़ पा रहे। सरकार का कुछ ऐसा ही रवैया लोकायुक्त कार्रवाई के बाद कार्रवाई की अनुशंसा पर रहता है। छापे या रिश्वतखोरी में पकड़ाए अफसर के लिए लोकायुक्त पुलिस हटाने या सस्पेंड करने की चिट्‌ठी लिखती है, पर उस पर कार्रवाई होते-होते कई बार कर्मचारी सेवानिवृत्त ही हो जाता है।


कई मामले तो पांच साल पुराने
अकेले सरकार के विधि और विधायी कार्य विभाग के पास 190 से ज्यादा भ्रष्टाचार से जुड़े मामले अभियोजन स्वीकृति के लिए लंबित हैं। इनमें से कुछ मामले तो 5 साल पुराने हैं। इंदौर नगर निगम तथा दूसरे निकायों के भी 44 से अधिक मामले अभियोजन स्वीकृति की राह देख रहे हैं।

22 मामले, कार्रवाई नहीं हुई, कर्मचारी रिटायर हो गए

प्रदेश भर में लोकायुक्त संगठन से जुड़े 22 मामले ऐसे हैं, जिनमें दोषी कर्मचारियों के रिटायर हो जाने के कारण उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जा सकी। कुछ प्रकरणों में तो लोकायुक्त की रिपोर्ट पर सरकार 10 साल तक चुप्पी साधे रही। इन सभी मामलों में लोकायुक्त ने जांच में अधिकारी-कर्मचारियों को दोषी पाया था। सालों तक कुछ नहीं हुआ इसी बीच में कर्मचारी रिटायर हो गए। पेंशन नियमों के चलते सरकार चाह कर भी उन पर कोई कार्रवाई नहीं कर सकती। आर्ट एंड कॉमर्स कॉलेज के लक्ष्मीनारायण शर्मा के मामले में लोकायुक्त की अनुशंसा पर सरकार ने 8 साल तक कुछ नहीं किया। जल संसाधन विभाग के कार्यपालन यंत्री एमएस चूड़ावत, खंडवा नगर निगम के एसआर पाटीदार के मामले में सरकार 10 साल तक चुप बैठी रही। गौरतलब है प्रदेश सरकार के पेंशन नियमों के अनुसार सेवानिवृत्ति के 4 साल बाद दोषी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जा सकती।

आईएएस थेटे पर 18 मामले
लोकायुक्त की वेबसाइट के मुताबिक सरकार से अभियोजन स्वीकृति का इंतजार कर रहे प्रकरणों में सबसे ज्यादा 18 मामले उज्जैन के तत्कालीन अपर आयुक्त अधिकारी रमेश थेटे के हैं। इंदौर नगर निगम के पूर्व स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. राजेश कोठारी का मामला 2013 और इंदौर विकास प्राधिकरण के संपदा अधिकारी मनीष शर्मा का मामला 2016 से सरकार के पास स्वीकृति के लिए लंबित है। नगर निगम के इंजीनियर दिलीप सिंह चौहान के लिए तो लोकायुक्त पुलिस कई बार चिट्‌ठी लिख चुकी है, पर अभियोजन की मंजूरी नहीं मिल रही।

विभागीय कार्रवाई के 170 मामले लंबित
शिकायत पर जांच में दोषी पाए जाने पर कई मामलों में लोकायुक्त पुलिस संबंधित विभागों को कर्मचारी के खिलाफ विभागीय जांच, निलंबन या तबादले की अनुशंसा करती है। विभाग अपने अधिकारी-कर्मचारियों को बचाने के लिए अनुशंसा की फाइल दबा देते हैं। अलग-अलग विभागों के ऐसे 170 प्रकरणों में न विभागीय जांच हुई न कार्रवाई। इसमें 33 मामले ऐसे हैं, जिनमें 10 साल पहले कार्रवाई की अनुशंसा की गई थी। सबसे ज्यादा 71 प्रकरण लोक निर्माण विभाग के हैं, 28 प्रकरणों के साथ जल संसाधन विभाग दूसरे स्थान पर है। पुलिस महकमा जरूर ऐसा है, जहां अनुशंसा पर सबसे जल्द कार्रवाई होती है।

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