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संस्कृत नाटकों में भाषा ही निर्देशक के लिए बड़ी चुनौती

नाट्य लेखक और निर्देशक सतीश दवे का कहना है कि वाट्ससपिया और फेसबुकिया पीढ़ी के दौर में संस्कृत में नाटक खेलना ही...

Danik Bhaskar | Sep 12, 2018, 03:41 AM IST
नाट्य लेखक और निर्देशक सतीश दवे का कहना है कि वाट्ससपिया और फेसबुकिया पीढ़ी के दौर में संस्कृत में नाटक खेलना ही अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। सोशल मीडिया पर लगातार सक्रिय इस पीढ़ी में भाषा के प्रति जो उदासीनता और लारपवाही पैदा हुई है, उसके चलते हमारे पास जो भाषा है, वह हिंदी तो नहीं ही है। ऐसे में संस्कृत में नाटक खेलना बहुत दुष्कर है। यह बात उन्होंने सिटी भास्कर से कही। वे संस्कृत नाट्य महोत्सव में नाटक कालिदासचरितम् मंचित करने इंदौर आए थे।

युवा अभिनेताओं को संस्कृत नाटकों के लिए किया प्रशिक्षित

उन्होंने कहा कि संस्कृत भाषा के नाटकों में इम्प्रोवाइज़ेश नहीं किया जा सकता क्योंकि क्लासिक नाटकों में लिखा गया है उसे बदला नहीं जा सकता। निर्देशक के लिए यह दूसरी बड़ी रचनात्मक चुनौती है। मैंने बरसों 6 से 14 साल के बच्चों के साथ नाटक किए और 14 साल की उम्र होने के बाद उन्हें मैंने संस्कृत नाटकों के लिए प्रशिक्षित किया। उनके अभिनेता का परिष्कार किया। और यही कारण है कि वे कालिदासचरितम् नाटक में बेहतर ढंग से अभिनय कर सके। मैंने इस नाटक का मालवी रूपांतरण भी प्रस्तुत किया है।