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देश के हर बदलाव का प्रतिबिम्ब रहा है हमारा सिनेमा और संगीत

मराठी निर्माता-निर्देशक मिलिंद अोक का कहना है कि हिंदी-मराठी फिल्में समाज का एक ऐसा प्रतिबिम्ब रही हैं जिसमें हर...

Danik Bhaskar | Jun 11, 2018, 02:50 AM IST
मराठी निर्माता-निर्देशक मिलिंद अोक का कहना है कि हिंदी-मराठी फिल्में समाज का एक ऐसा प्रतिबिम्ब रही हैं जिसमें हर दौर के बदलावों को गहराई और पूरी कलात्मकता के साथ अभिव्यक्त किया गया है।

हर दौर में अच्छी और बुरी फिल्में बनती रही हैं। इसी तरह अच्छा और बुरा संगीत भी रचा गया है, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि फिल्मों की विषयवस्तु और गीतों में समाज के हर परिवर्तन को दर्ज़ करने की जबर्दस्त खूबियां रही हैं। इसीलिए सिनेमा (और क्रिकेट) ने देश को कश्मीर से कन्याकुमारी तक जोड़ने में अपनी महती भूमिका निभाई है। यह बात उन्होेंने सिटी भास्कर से बातचीत मेें कही। वे सानंद के तहत यूनिवर्सिटी ऑडिटोरियम में प्रभात ते सैराट कार्यक्रम के सिलसिले में इंदौर आए हैं।

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मिलिंद ओक

एक दौर टाइमपास सिनेमा का भी रहा है

उन्होंने कहा कि आज़ादी के बाद सिनेमा ने एक आदर्शवादी समाज को चित्रित किया क्योंकि आज़ादी के बाद जनता को उम्मीद थी कि आज़ादी के लिए जो संघर्ष किया गया उसके बाद देश के हालात बेहतर होंगे। इसीलिए उस समय आदर्शवादी सिनेमा बनाया गया और इसीलिए उसमें जनता के दु:ख-दर्द और उसका संघर्ष बताया गया। लेकिन उसके बाद मोहभंग हुआ तो सिनेमा ने वह भी दर्ज किया। उसी तरह के गीत लिखे जाने लगे, संगीत रचा गया। कालांतर में एंग्री यंगमैन के रूप अमिताभ बच्चन आए जिनके जरिए समाज ने अपना आक्रोश व्यक्त किया। फिर एक दौर ऐसे सिनेमा का भी आया जिसे टाइमपास सिनेमा कह सकते हैं जिसके केंद्र में शाहरुख खान हैं। और अब फिर बेहतर सिनेमा बनाया जा रहा है। मराठी फिल्मों के साथ भी यही हुआ। वह भी बदलते दौर को चित्रित करता रहा। लेकिन मराठी फिल्मों को बॉलीवुड फिल्मों से संघर्ष करना पड़ा। मराठी और हिंदी फिल्मों का संबंध सगी बहनों जैसा है। यह वैसा ही है एक रईस बहन, गरीब बहन के पड़ोस में रहने आ जाए और रईस बहन के जीने के अंदाज़ का असर छोटी बहन पर पड़ने लगे। लेकिन मराठी सिनेमा ने कल्पनाशीलता और प्रयोगधर्मिता से अलग पहचान कायम कर ली।