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लघुकथाओं के जरिए पर्यावरण की चिंता को किया अभिव्यक्त

शहर की चुनिंदा लेखिकाअों ने अपनी रचनात्मक को नए आयाम देते हुए पर्यावरण की चिंता और सरोकार को अपनी लघुकथाओं के जरिए...

Bhaskar News Network | Last Modified - Jun 11, 2018, 02:50 AM IST

लघुकथाओं के जरिए पर्यावरण की चिंता को किया अभिव्यक्त
शहर की चुनिंदा लेखिकाअों ने अपनी रचनात्मक को नए आयाम देते हुए पर्यावरण की चिंता और सरोकार को अपनी लघुकथाओं के जरिए अभिव्यक्त किया। इन लघुकथाओं में कथ्य तो मार्मिक था ही, पेड़, घोंसला, हवा-पानी और इस तरह पूरी प्रकृति के प्रति एक मातृत्व भाव भी था और साथ ही सकारात्मक संदेश भी था कि हम कैसे अपनी इस हरा-भरी धरा को बचा सकते हैं। वामा साहित्य मंच के "मेरा पर्यावरण : मेरी जिम्मेदारी' के तहत सदस्याओं ने लघुकथाओं का पाठ किया। यह कार्यक्रम विनम्रता से जता गया कि कैसे साहित्य को अपने समय-समाज के सरोकारों से जोड़ा जा सकता है।

Literary Programme

महादेवी वर्मा पुस्तकालय में किए गए कार्यक्रम में बड़ी संख्या में महिला सदस्यों ने शिरकत की।

तोहफे में मिले पौधे से हृदय-परिवर्तन और घोंसला की सुंदरता

कार्यक्रम में डॉ. गरिमा संजय दुबे ने घोसला लघुकथा के जरिए बताया कि किस तरह हम टेक्नोलॉजी के कारण प्रकृति से दूर हो रहे हैं और इसके पास जाने पर नई पीढ़ी कैसे अपने को उन्मुक्त और प्रकृति के साथ पंख लगाकार उड़ने लगती है। ज्योति जैन की लघुकथा नीम का पेड़ यह अभिव्यक्त करती है कि घर में पिता की ख्वाहिश के खिलाफ पुत्र गैराज और बाउंड्री वॉल बनाने के लिए नीम का पेड़ काटना चाहता है लेकिन पुत्र का पुत्र जब उसे फादर्स डे पर पौधा तोहफे में देता है तो वह अपना यह फैसला बदल लेता है। रश्मि वागले ने संकल्प, चारूमित्रा नागर ने हवा का कर्ज, प्रतिभा श्रीवास्तव ने छांव, अंजू निगम ने बालकनी, वसुधा गाडगिल ने इंसानी बस्ती, आशा वडनेरे ने गुलाब और कांटे, मंजू मिश्रा ने सास, बहू और पर्यावरण, वीनिका शर्मा ने प्रायश्चित, रेमी जायसवाल ने नई राह, शोभा प्रजापति ने आशीर्वाद, निरुपमा नागर ने अंतिम निर्णय, दीपा व्यास ने वृक्षपात, विद्यावती पाराशर ने शपथ, पद्मा राजेन्द्र ने चेतावनी, रंजना फतेहपुरकर ने श्रद्धांजलि, भावना दामले ने हम कब सुधरेंगे, बबीता कड़ाकिया ने "मत रूठो मां' शीर्षक से लघुकथा सुनाई।

पर्यावरण के प्रति दायित्वों को ईमानदारी से निभाएं

पर्यावरणविद् पद्मश्री जनक पलटा ने "पर्यावरण को प्लास्टिक के कैसे बचाएं' विषय पर कहा कि क्या आप जानते हैं कि समूचे विश्व में इतना प्लास्टिक फेंका जाता है कि इससे पृथ्वी के चार घेरे बन सकते हैं। प्लास्टिक को खत्म होने में 500 से हज़ार साल लगते हैं। यह जहर हम सबकी ज़िंदगी के लिए जानलेवा साबित हो रहा है। प्लास्टिक के विकल्पों को तेजी से अपनाना होगा तब कहीं जाकर हम अपने दायित्वों को ईमानदारी निभा सकेंगे। संचालन स्नेहा काले ने किया। सरस्वती वंदना विद्यावती पाराशर ने प्रस्तुत की। अतिथि परिचय स्मृति आदित्य ने दिया और आभार मालिनी शर्मा ने माना।

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