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युवती के शिप्रा में कूदकर खुदकुशी मामले में कोर्ट का सवाल घटना सही थी तो चश्मदीद गवाह 3 माह तक चुप कैसे रहे?

Dainik Bhaskar

Jun 10, 2018, 03:25 AM IST

News - जिला अदालत ने एक फैसले में कड़ी टिप्पणी की कि घटना के तीन माह बाद थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई गई। कहानी सच है और दो...

युवती के शिप्रा में कूदकर खुदकुशी मामले में कोर्ट का सवाल घटना सही थी तो चश्मदीद गवाह 3 माह तक चुप कैसे रहे?
जिला अदालत ने एक फैसले में कड़ी टिप्पणी की कि घटना के तीन माह बाद थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई गई। कहानी सच है और दो गवाह चश्मदीद थे तो वे तीन माह तक चुप कैसे बैठे रहे? इससे स्पष्ट है कि कल्पना के आधार पर कहानी गढ़कर तीन माह बाद आरोपी के खिलाफ बढ़ाकर बयान करवाकर रिपोर्ट कराई गई। रची हुई कहानी के आधार पर किसी को दोषी नहीं माना जा सकता।

22 सितंबर 2015 को की थी आत्महत्या

मामला एक युवती के शिप्रा नदी में कूदकर खुदकुशी का है। घटना 22 सितंबर 2015 की है और उसकी रिपोर्ट 26 दिसंबर 2015 को कराई गई। 22 सितंबर 2015 को सुबह 10 बजे युवती राखी शिप्रा नदी में कूदी थी। उससे पहले सुबह साढ़े आठ-पौने नौ बजे के मध्य राखी का सौरभ नामक युवक से विवाद हुआ था। घटना के पहले राखी ने युवक को फोन कर कहा था कि वह शिप्रा नदी में जान दे रही है। युवक वहां पहुंचा तब तक युवती नदी में कूद चुकी थी। अन्य लोगों के साथ युवक ने उसे बचाने का प्रयास किया लेकिन उसकी मौत हो चुकी थी। घटना के तीन माह बाद पुलिस में दर्ज रिपोर्ट के अनुसार सौरभ से विवाद के कारण ही राखी ने नदी में कूद कर जान दी। इस पर पुलिस ने सौरभ के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में धारा 306 के तहत प्रकरण दर्ज किया था।

दोनों गवाहों के बयान में भी विरोधाभाष

अपर सत्र न्यायाधीश वर्षा शर्मा के समक्ष मृतका के पिता ने बयान में कहा कि आरोपी उसकी पुत्री से विवाह के लिए इनकार कर रहा था और विवाद में आरोपी ने कहा था कि मरना है तो मर जाओ। इसी कारण उसकी पुत्री ने नदी में छलांग लगाकर जान दी। बचाव पक्ष की ओर से एडवोकेट अमरसिंह राठौर एवं एडवोकेट अरविंद यादव ने मृतका के पिता से क्रॉस किए तो उन्होंने कहा वे घटनास्थल पर मौजूद नहीं थे। घटना के बारे में उन्हें दोनों चश्मदीद गवाहों ने बताया था। क्रॉस में दोनों गवाहों के कथन में विरोधाभास सामने आया। इस पर कोर्ट ने माना कि दोनों गवाहों ने बढ़ा-चढ़ाकर कथन दिए क्योंकि वे चश्मदीद गवाह थे तो तीन माह तक चुप कैसे बैठे रहे। इससे स्पष्ट है कि योजना के तहत और कल्पना के आधार पर कहानी रची गई। ऐसे में आरोपी को दोषी नहीं माना जा सकता।

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