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मान्यता नियमों के चलते नर्सिंग कॉलेजों का नया सत्र अधर में

इंदौर/ग्वालियर

Danik Bhaskar | Jun 12, 2018, 03:35 AM IST
इंदौर/ग्वालियर
देशभर में बीएससी नर्सिंग, ऑक्सीलरी नर्सिंग मिडवाइफरी (एएनएम), जनरल नर्सिंग एंड मिडवाइफरी (जीएनएम) कोर्स संचालित करने वाले कॉलेजों को इंडियन नर्सिंग काउंसिल द्वारा मान्यता दी जाती थी। सभी राज्यों की नर्सिंग काउंसिल को डिप्लोमा कोर्सों और संबंधित यूनिवर्सिटी को डिग्री कोर्सों की परीक्षा आयोजित कराने की जिम्मेदारी दी जाती थी। कर्नाटक स्टेट एसोसिएशन ऑफ द मैनेजमेंट ऑफ नर्सिंग एंड एलाइड हेल्थ साइंसेज इंस्टीट्यूशंस व नर्सिंग कॉलेज संचालकों ने कर्नाटक हाईकोर्ट में आईएनसी के विरुद्ध याचिका दायर की थी।

इस पर सुनवाई करते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट ने आईएनसी द्वारा कॉलेजों को मान्यता देने के अधिकार पर रोक लगा दी। इस मामले की अपील सुप्रीम कोर्ट में की गई। सुप्रीम कोर्ट ने भी गत सितंबर 2017 में आईएनसी द्वारा कॉलेजों को मान्यता देने के अधिकार को अनधिकृत माना। इसके चलते स्टेट काउंसिल को मान्यता देने के आदेश दिए गए हैं। स्टेट काउंसिल के अफसर पिछले नौ माह में मान्यता संबंधी नियम तैयार ही नहीं करा पाए हैं। एक शिकायत के आधार पर डीबी स्टार टीम ने मामले की पड़ताल की, तो खुलासा हुआ कि नर्सिंग कॉलेजों में एडमिशन की प्रक्रिया अप्रैल माह में शुरू करा दी जाती है, लेकिन इस वर्ष जून माह तक भी मान्यता और एडमिशन के संबंध में कोई निर्णय नहीं लिया जा सका है। बीएससी नर्सिंग, एएनएम और जीएनएम जैसे नर्सिंग कोर्सों का वर्ष 2018-19 का नया सत्र अधर में फंस गया है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मध्यप्रदेश नर्सिंग रजिस्ट्रेशन काउंसिल को प्रदेश के 600 से अधिक नर्सिंग कॉलेजों की मान्यता और एडमिशन संबंधी नियम तैयार करने थे, लेकिन अभी तक मध्यप्रदेश में यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई है।

सकते में नर्सिंग रैकेट

नर्सिंग कॉलेजों में एडमिशन के नाम पर रैकेट काम करता है। इसमें कॉलेज संचालकों से लेकर दलालों तक की भूमिका रहती है। इस वर्ष यह पूरा रैकेट सकते में है। नर्सिंग के नाम पर प्रदेश में हर साल लगभग 100 करोड़ रुपए से अधिक का कारोबार होता है। मप्र शासन की तरफ से नर्सिंग की फीस 25000 रुपए प्रति वर्ष तय की गई है, लेकिन कॉलेजों में छात्रों से 45 हजार रुपए प्रति वर्ष लिया जाता है। तीन साल के जीएनएम के लिए छात्रों से डेढ़ लाख रुपए तक लिए जाते हैं। वहीं एएनएम के लिए 60 से 65 हजार रुपए वसूल किए जाते हैं।

हम व्यवस्था कर रहे हैं

 हमें सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद नियम तैयार करने हैं। इसके लिए हम प्रक्रिया भी कर रहे हैं। यह सही है कि नियमों के कारण शैक्षणिक सत्र समय पर शुरू नहीं हो पाएगा, लेकिन हम इसका भी कोई रास्ता निकालेंगे। फिलहाल हमारा प्रयास है कि मान्यता संबंधी नियम जल्द से जल्द तैयार हो सकें। शरद जैन, राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार), चिकित्सा शिक्षा विभाग मप्र

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देशभर में बीएससी नर्सिंग, ऑक्सीलरी नर्सिंग मिडवाइफरी (एएनएम), जनरल नर्सिंग एंड मिडवाइफरी (जीएनएम) कोर्स संचालित करने वाले कॉलेजों को इंडियन नर्सिंग काउंसिल द्वारा मान्यता दी जाती थी। सभी राज्यों की नर्सिंग काउंसिल को डिप्लोमा कोर्सों और संबंधित यूनिवर्सिटी को डिग्री कोर्सों की परीक्षा आयोजित कराने की जिम्मेदारी दी जाती थी। कर्नाटक स्टेट एसोसिएशन ऑफ द मैनेजमेंट ऑफ नर्सिंग एंड एलाइड हेल्थ साइंसेज इंस्टीट्यूशंस व नर्सिंग कॉलेज संचालकों ने कर्नाटक हाईकोर्ट में आईएनसी के विरुद्ध याचिका दायर की थी।

इस पर सुनवाई करते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट ने आईएनसी द्वारा कॉलेजों को मान्यता देने के अधिकार पर रोक लगा दी। इस मामले की अपील सुप्रीम कोर्ट में की गई। सुप्रीम कोर्ट ने भी गत सितंबर 2017 में आईएनसी द्वारा कॉलेजों को मान्यता देने के अधिकार को अनधिकृत माना। इसके चलते स्टेट काउंसिल को मान्यता देने के आदेश दिए गए हैं। स्टेट काउंसिल के अफसर पिछले नौ माह में मान्यता संबंधी नियम तैयार ही नहीं करा पाए हैं। एक शिकायत के आधार पर डीबी स्टार टीम ने मामले की पड़ताल की, तो खुलासा हुआ कि नर्सिंग कॉलेजों में एडमिशन की प्रक्रिया अप्रैल माह में शुरू करा दी जाती है, लेकिन इस वर्ष जून माह तक भी मान्यता और एडमिशन के संबंध में कोई निर्णय नहीं लिया जा सका है। बीएससी नर्सिंग, एएनएम और जीएनएम जैसे नर्सिंग कोर्सों का वर्ष 2018-19 का नया सत्र अधर में फंस गया है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मध्यप्रदेश नर्सिंग रजिस्ट्रेशन काउंसिल को प्रदेश के 600 से अधिक नर्सिंग कॉलेजों की मान्यता और एडमिशन संबंधी नियम तैयार करने थे, लेकिन अभी तक मध्यप्रदेश में यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई है।