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कॉलेज टाइम में एक्सपेरिमेंट्स कीजिए, आप यह तो समझ ही जाएंगे कि क्या नहीं करना है

यंग स्टार्टअप्स के लिए शनिवार को शहर में स्टार्टअप ग्राइंड इवेंट कराया गया। वायरल कंटेंट कंपनी विटीफीड के फाउंडर...

Bhaskar News Network | Last Modified - Jun 12, 2018, 03:40 AM IST

कॉलेज टाइम में एक्सपेरिमेंट्स कीजिए, आप यह तो समझ ही जाएंगे कि क्या नहीं करना है
यंग स्टार्टअप्स के लिए शनिवार को शहर में स्टार्टअप ग्राइंड इवेंट कराया गया। वायरल कंटेंट कंपनी विटीफीड के फाउंडर विनय सिंहल ने यंग आंत्रप्रेन्योर्स को अपनी स्टोरी सुनाते हुए बताया कि स्टार्टअप सेट करने और मेंटेन करने में क्या-क्या मुसीबतें आती हैं। इंजीनियर बाबू की फाउंडर अदिति चौरसिया ने उनसे कुछ सवाल किए और विनय ने अपने चिर परिचित बेबाक अंदाज़ में उनके मज़ेदार जवाब दिए। हर बार की तरह उनकी साफगोई सबको भा गई। पढ़िए कुछ ऐसे सवाल जो हर यंग स्टार्टअप आठ साल में 400 करोड़ के वैल्यूएशन वाले स्टार्टअप के फाउंडर से पूछना चाहता है।

विटिफीड के फाउंडर विनय सिंघल ने स्टार्टअप्स को बताया आंत्रप्रेन्योर्स की चुनौतियों के बारे में

Q. छोटे शहरों में स्टार्टअप्स का क्या सीन है ?

A. छोटे शहरों में काम करने के बहुत फायदे हैं। सब एक-दूसरे को जानते हैं। कॉलेज के दोस्त, पहचान के बिज़नेसमैन, कॉर्पोरेट, यही आपका सपोर्ट सिस्टम बनते हैं। आठ साल पहले हम नोएडा में ऑफिस देख रहे थे। 150 रुपए स्क्वेयर फीट में जगह मिली। वहीं इंदौर में हमें 25 रुपए स्क्वेयर फीट में प्रीमियम लोकेशन पर उससे भी बड़ा ऑफिस मिल गया। दिल्ली में एक सीट के लिए इतना पैसा देना पड़ता है जितने में यहां इंदौर में हम दो लोग हायर कर सकते हैं। इंदौर में लॉयल्टी की बात बताता हूं। मान लो कि कोई विटीफीड में काम करता है और उसे जॉब स्विच करना है। कहां करेगा। यहां ज्यादा ऑप्शन नहीं है। लॉयल्टी अपनेआप मिल जाती है।

Q. क्या कॉलेज की पढ़ाई काम आती है इसमें ?

A. पढ़ाई से ज्यादा कॉलेज एक्सपेरिमेंट करने के लिए है। गलतियां कीजिए। खुद को समझिए। लाइफटाइम फ्रेंड्स बनाइए। नेटवर्किंग कीजिए। वो सब कीजिए जो आपको लगता है कि आप कर सकते हैं। इतना तो समझ आ ही जाएगा कि आप ज़िंदगी में क्या नहीं करना चाहते हैं। मैंने कम्प्यूटर साइंस लिया था। मुझे सेकंड इयर में ही महसूस हो गया था ये तो नहीं करना है।

Q. आपके स्ट्रगल के बारे में कुछ बताइए।

A. कंपनी चलाने के लिए सिर्फ प्रोडक्ट और सर्विसेस नहीं, बहुत कुछ लगता है। डेढ़ साल से मैं एचआर का काम सीख रहा हूं और मेरा अनुभव है कि एम्प्लॉईज़ को खुश रखना भगवान को धरती पर लाने जैसा है। उन्हें परफॉर्म करने के लिए मोटिवेट करना भी आसान नहीं है। ऑफिस के क्लीनिंग स्टाफ को मैं कैसे मोटिवेट करूं कि बगैर बोले वे फ़्लोर साफ़ रखें। हाउस कीपिंग स्टाफ को कैसे मोटिवेट करूं कि कॉफी मशीन सुबह 9.30 बजे स्टार्ट कर लें ताकि 10 बजे जब सब आएं तो उन्हें कॉफी मिल जाए। केआरए नहीं पता था मुझे क्या होता है। सीखा पूरा काम। मेरा अनुभव रहा है कि जिनका सिर्फ प्रोडक्ट सबसे अच्छा होता है वो अक्सर सफल नहीं होते। आइडिया में हम सब अच्छे हैं, लेकिन स्टार्टअप चलाना, मेंटेन करना रियल स्ट्रगल है।

Q. आठ सालों में सबसे मुश्किल क्या रहा ?

A. कम्फर्ट ज़ोन से बाहर निकलना। हमें अपने पुराने बेस्ट को छोड़ना सीखना होगा। "लेट गो' करना हमें आता ही नहीं है, लेकिन डिसरप्शन ज़रूरी है।

Q. एक इस पैशन के लिए हम बहुत कुछ छोड़ भी देते हैं। वर्क-लाइफ़ बैलेंस कैसे करते हैं ?

A. भारत में डॉक्टर इंजीनियर और सीए बनने के लिए फोर्स किया जा सकता है, लेकिन आंत्रप्रेन्योर बनने के लिए कोई फोर्स नहीं करता। जब आप अपनी चॉइस से आंत्रप्रेन्योर बने हैं तो फिर स्ट्रेस और कन्फ्यूजन क्यों। अपनों को समझाइए कि आपका काम क्या और कैसा है। जो आपसे प्यार करते हैं, आपको समझते हैं, यदि आप उन्हें ही नहीं कन्विंस कर सकते तो दुनिया को कैसे समझाएंगे। उन्हें सेम पेज पर लाइए। यह थोड़ा मुश्किल है, लेकिन हो सकता है। मैं अपने पिता को उनकी दुकान से रिलेट करके बताता हूं अपनी कंपनी के बारे में। और ऐसा मैं हफ्ते में दो बार करता हूं। -शेष पेज 24 पर

यंग आंत्रप्रेन्योर्स ने विनय से जाना कैसे मेंटेन करें स्टार्टअप

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