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बाग प्रिंटिंग से पहले उबाला, पीटा और रौंदा जाता है कपड़ा, 15 दिन में तैयार होती है एक साड़ी

किसी भी कला पर उस जगह की मिट्टी, जलवायु, नदी-पहाड़ों, पशु पक्षियों और वनस्पति का असर कितना होता है यह बाग कला की कहानी...

Bhaskar News Network | Last Modified - Jul 13, 2018, 03:40 AM IST

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    किसी भी कला पर उस जगह की मिट्टी, जलवायु, नदी-पहाड़ों, पशु पक्षियों और वनस्पति का असर कितना होता है यह बाग कला की कहानी जानने पर महसूस होता है। बाग कला सिर्फ लकड़ी के ठप्पों से कपड़ों पर की जाने वाली छपाई नहीं है। एक साड़ी तैयार करने में 15 दिन लग जाते हैं। कपड़े को तेज़ आंच पर खौलाया जाता है, पैरों से रौंदा भी जाता है। बुनाई से लेकर रंगाई, छपाई तक कई कारीगर मिलकर ये सुंदर नमूने तैयार करते हैं।

    महेश्वरी और चंदेरी सिल्क व कॉटन पर ऐसी ही कारीगरी वाली साड़ियां, दुपट्टे लेकर बाग से आए हैं मोहम्मद सईम अंसारी। इनका परिवार तीन पीढ़ियों से यह काम कर रहा है। उन्होंने बताया कि समय के मुताबिक बाग छपाई में थोड़ा बदलाव तो आया है लेकिन फिर भी और परम्पराओं के मुकाबले इस पर बाज़ार और बदलाव का असर कम हुआ है। आज भी फूल, जड़, लोहा और फल-पत्तियों का इस्तेमाल किया जाता है इन्हें रंगने के लिए। यही इनकी खासियत है।

    शहर में चल रहे बाग महोत्सव में एग्ज़ीबिट की गई हैं बाग प्रिंट की साड़ियां और दुपट्‌टे‌।

    कपड़ा : संचरे, बकरी की लीद, अरंडी के तेल में गलाते हैं, फूल व जड़ों संग पानी में उबालते हैं

    कपड़ा रातभर गलाते हैं। सुबह उसे कूटते हैं। फिर संचरा, अरंडी का तेल और बकरी की लीद मिक्स कर उसे पानी में घोलते हैं और कपड़े को इसमें भिगोते हैं। दूसरे दिन कपड़ा सुखाते हैं। एक बार फिर कपड़े को पानी में गलाते हैं और दोबारा कूटते हैं। इस तरह कूटने और सुखाने की प्रक्रिया तीन बार की जाती है। ऐसा इसलिए ताकि कॉटन में लगा अतिरिक्त स्टार्च निकल जाए और कपड़े का हर रेशा डाई सोख सके। कपड़े को पीलापन देने के लिए उसे हरड़ और बाहेड़ा पाउडर के पानी में गलाते हैं, सुखाते हैं। फिर धवड़ी फूल और आल ट्री की जड़ों के साथ तांबे के बड़े बर्तन में पानी के साथ खौलाते हैं।

    रंगाई : अनार, हरड़, लोहे व गुड़ का रंग

    कपड़े को फिटकरी व इमली के चीयों का पाउडर घुले पानी में गलाने से सुर्खी वाला पीला रंग मिलता है। मस्टर्ड यलो अनार के छिलके उबालकर बनाते हैं। काला रंग जंग लगे लोहे और गुड़ को पानी में गलाकर हैं। ज़मीन में छह फीट का गड्ढा कर मिट्टी के बर्तन में लोहा व गुड़ डला पानी 15 दिन ढंककर रखना पड़ता है। रंग पक्का करने के लिए ग्वार पेड़ के गोंद में कपड़ा गलाते है।

    छपाई : लकड़ी के छापों को डाई में डुबोकर उन्हें कपड़ों पर रखकर छपाई की जाती है। अधिकतर छापे आसपास की प्राकृतिक संपदा या ऐतिहासिक इमारतों के होते हैं। मूंग की फली, फूल बूटा और भिंडी प्रिंट खास है।

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