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निजी बसें परेशानी का सबब, न किराया न समय तय

जि स दिन सरकार ने सड़क परिवहन निगम को बंद करने का फैसला किया था, उस दिन उसके कर्मचारियों से ज्यादा सदमा उन लोगों को...

Bhaskar News Network | Last Modified - Jun 14, 2018, 04:05 AM IST

निजी बसें परेशानी का सबब, न किराया न समय तय
जि स दिन सरकार ने सड़क परिवहन निगम को बंद करने का फैसला किया था, उस दिन उसके कर्मचारियों से ज्यादा सदमा उन लोगों को लगा, जो नियमित रूप से इसमें सफर करते थे। ऐसा सुरक्षित सफर, जिसमें न जान न माल के नुकसान का डर। लंबे सफर के लिए लोग अकेली महिला या बच्चों को भी नि:संकोच भेजे देते, ड्राइवर-कंडक्टर के भरोसे। छेड़छाड़, हादसे जैसी बातें होना तो दूर, कभी मन में ऐसी घटनाओं की आशंका भी नहीं रहती। खड़खड़ बजती खिड़कियों, गड्ढों से लगते दचकों के बीच चार आने की संतरे की गोलियों के साथ सफर तो फिर भी सुहावना ही होता था। 13-14 साल पहले इन बसों के चक्के थमे तो जैसे कई लोगों की जिंदगी थम गई।

बहरहाल, एक दशक से ज्यादा निजी बस वालों की बेहूदगी, झकझोर देने वाली घटनाओं और सैकड़ों हादसों के बाद सरकार फिर जागी है और नए सिरे से इंटरसिटी और इंट्रा सिटी बसें शुरू करने जा रही है। हालांकि इसकी तैयारी इंदौर-भोपाल में निजी क्षेत्र की भागीदारी के साथ शुरू हुई चार्टर्ड बसों के साथ हो चुकी है, पर अब 1600 बसें एक साथ शुरू की जाएंगी, जिनसे कई छोटे-बड़े शहर और कस्बे आपस में जुड़ेंगे। इसके शुरू होने से उम्मीद है कि यात्रियों को आ रही परेशानियों में थोड़ी कमी आएगी, क्योंकि अब भी कई बिंदु ऐसे हैं, जिन पर ध्यान देने की जरूरत है, वरना, नई बस सेवा भी निजी की तरह सिरदर्द बनकर रह जाएगी। मसलन, इंदौर से भोपाल जाना तो बेहद आसान है, लेकिन किसी को इन दोनों बड़े शहरों के बीच में आने वाले सोनकच्छ, आष्टा जाना हो तो वह बहुत मुश्किलभरा हो जाता है। सरकारी चार्टर्ड बस यहां रुकती नहीं और निजी बस वाले बायपास पर उतार देते हैं, यानी यात्रियों की फजीहत। अगर कोई बस भीतर भी जाती है तो यहां से बैठने वाले यात्रियों को सीट नहीं मिलती, यह दूसरी बड़ी परेशानी है। फिर हर बस का किराया अलग। दो से पांच रुपए का अंतर छोटी दूरी के कस्बों या गांवों के बीच आम है। ये रूट तो सिर्फ उदाहरण है। ऐसे प्रदेश में सैकड़ों छोटे-बड़े कस्बे होंगे, जो मुख्य मार्ग पर होने या बायपास बनने के बाद बस सेवा से पूरी तरह कट चुके हैं। यह ध्यान रहे कि इन कस्बों से ही बसों को ज्यादा यात्री मिलते हैं, इसलिए इनका ख्याल रखना जरूरी है। तीसरा विषय समय की पाबंदी का है, बसें समय से चलें और समय से पहुंचें तो ही सुविधा कहलाती हैं, अन्यथा छोटे से सफर में लोगों का पूरा दिन बिगड़ जाए तो ऐसी बसों का भी कोई फायदा नहीं है। उम्मीद है कि नई बस सेवा इन सारी बातों पर खरा उतरेगी।

-गीतेश द्विवेदी

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