इंसानों की वजह से महज़ 60 दलदल हिरण रह गए थे एमपी में / इंसानों की वजह से महज़ 60 दलदल हिरण रह गए थे एमपी में

Bhaskar News Network

May 18, 2018, 04:45 AM IST

News - हार्ड ग्राउंड बारहसिंघा जिसे हिंदी में दलदल हिरण भी कहा जाता है, हमारे प्रदेश का राज्य पशु है। कई सालों तक जंगल के...

इंसानों की वजह से महज़ 60 दलदल हिरण रह गए थे एमपी में
हार्ड ग्राउंड बारहसिंघा जिसे हिंदी में दलदल हिरण भी कहा जाता है, हमारे प्रदेश का राज्य पशु है। कई सालों तक जंगल के दोहन, जानवरों के अंधाधुंध शिकार, बीमारियों और मानवीय अतिक्रमण के कारण ये विलुप्त होने की कगार तक पहुंच गए थे। 1970 में जब इनके संरक्षण के लिए कार्यक्रम चलाया गया तब राष्ट्रीय उद्यान में इनकी संख्या महज़ 60 थी। इनमें फैली बीमारी के कारण बारहसिंघा को एक स्थान पर रखना भी इनके लिए खतरनाक हो रहा था। दूसरे स्थान पर ले जाने के लिए उपयोग की जा रही बेहोशी की दवा भी इनके लिए जानलेवा बन रही थी। हेबीटेट इम्प्रूवमेंट और केप्टिव ब्रीडिंग के ज़रिए बड़े प्रयासों के बाद इन्हें बचाया जा सका।

ये बातें, टर्निंग द क्लॉक बैक- द बारहसिंघा रिटर्न्स फिल्म का हिस्सा थीं जो प्रदेश में चलाए गए बारहसिंघा सरंक्षण कार्यक्रम पर बनी थी। अनिल यादव द्वारा बनाई गई 25 मिनट की इस फिल्म का प्रदर्शन गुरुवार को पर्यावरण फिल्म फेस्टिवल में दिखाया गया। पर्यावरण से जुड़े अन्य मुद्दों की गंभीरता को भी फिल्मों के ज़रिए ही उठाया गया।

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टैंकरों से हर रोज़ बह जाता है एक हज़ार लीटर पानी

इक़बाल हुसैन और आजाद सिंह खिची की फिल्म नगर और पानी में बागली की कहानी बताई गई। यहां बने 12 घरों के लिए पानी की व्यवस्था टैंकर के ज़रिए की जाती है। टैंकर में पानी भरते समय, घरों तक इसके पहुंचने और पानी वितरण के दौरान पानी बर्बाद होता है। यहां तक की बाल्टियों से घरों तक ले जाते वक्त होने वाले नुकसान को भी फिल्म में गंभीरता से दिखाया गया। इस तरह लगभग हर दिन 1000 लीटर पानी किसी के काम आए बगैर ही बह जाता है। नलों में आने वाले ताज़े पानी के कारण रहवासी पहले से पड़ा पानी फेंक देते हैं। ये भी नुकसान है। इससे बेहतर ये होगा कि टैंकर के ज़रिए टंकी में पानी खाली किया जाए और वहां से लोग ज़रूरत के मुताबिक पानी लें।

झील में फैले कचरे से पैसे कमाता है बिल्ला

समारोह में सेविंद द वाइल्ड वाइल्डलाइफ रेस्क्यू एंड रिहैबिलिटेशन फिल्म दिखाई गई जिसका निर्देशन रीटा बैनर्जी ने किया है। फिल्म में काजीरंगा नेशनल पार्क द्वारा गैंडे, बाघ और उल्लू को बचाने के प्रयासों को दिखाया गया। जलालुद्दीन की फिल्म सेविंग द सेवियर में कश्मीर में रहने वाले 15 साल की बिल्ला की कहानी बताई जो वहां की वूलर झील पर फेंका हुआ कचरा इकट्‌ठा करता है। कचरे को बेचकर वो अपने परिवार के लिए पैसे कमाता है। फिल्म में वूलर लेक की गन्दगी के बारे में बताया गया है।

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