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हास्य के साथ कलाकारों की पीड़ा को रोचकता से बयां कर गया मस्तमौला

एक है सुरीले जो जाहिर है, गाता है। एक है रंगीले जो कवि है। एक है छबीले जो रंगकर्मी है। लेकिन तीनों ही उधार की ज़िंदगी...

Danik Bhaskar

Sep 12, 2018, 03:40 AM IST
एक है सुरीले जो जाहिर है, गाता है। एक है रंगीले जो कवि है। एक है छबीले जो रंगकर्मी है। लेकिन तीनों ही उधार की ज़िंदगी जीने के लिए इसलिए मजबूर हैं कि उनके अपने शहर में उनकी कला की कोई कद्र नहीं। वे किराए के मकान और उधारी कर जीवन जी रहे हैं।

यह उस नाटक मस्तमौला का मर्म है जो रंग यथार्थ समूह और एक कॉलेज के स्टूडेंट्स ने मिलकर मंगलवार को आनंदमोहन माथुर सभागृह में खेला गया। जयवर्धन के लिखे इस नाटक का निर्देशन गुलरेज़ खान ने किया। यह नाटक परिस्थितिजन्य हास्य के साथ इस संवाद के जरिए कलाकारों की पीड़ा को बयां कर जाता है कि शहर में मकान की नहीं, कला की कद्र करने वाले लोगों की कमी है।

कलाकारों की जद्दोजहद और बेहतर अभिनय : ये तीन कलाकार एक पंडितजी के किराएदार हैं और कला के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वे रोज़मर्रा की ज़िंदगी के लिए जद्दोज़हद करते है। वे कभी चायवाले, कभी पानवाले और कभी किरानेवाले से उधार करते हैं और पंडितजी के किराया मांगने पर अलग अलग ढंग से टालने की कोशिश करते हैं। एक दिन पंडितजी उनकी करतूतों से परेशान होकर उन्हें घर से निकाल देते हैं। चूंकि इस नाटक में स्टूडेंट्स ने अभिनय किया है लिहाजा इनके अभिनय में एक झिझकभरी सहजता भी थी और इम्प्रोवाइज़ेशन करने की कोशिशें भी थी। रंगीले के रूप में माइल्स एस. मिलन, सुरीले के रूप में विशाल जैन और छबीले के रूप में अंकेश शिंदे अपनी अभिनय संभावनाओं की बेहतर तलाश करते हैं। लेकिन फोकट के रूप में नौकर बने ऋषभ शर्मा ने अपने खिलंदड़े अभिनय के साथ इस किरदार को बेहतर ढंग से अभिनीत किया। पंडित बने भास्कर मिश्रा आरती बनी सलोनी इंडवे, पेपरवाला, दुकानदार और चायवाला का मो. राजिक क़ुरैशी, नकली बाप का रोशन सोनारे, ढ़ाबेवाले का शाहरुख खान, डॉक्टर का मयंक जोशी, दूधवाले का प्रदीप मीना ने किरदार निभाया।

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