एक राॅन्ग नंबर पर बातचीत का त्रासद इश्क में बदल जाना है "बादशाहत का ख़ात्मा...'

Indore News - मोहब्बत में नहीं है फर्क जीने और मरने का, उसी को देख कर जीते हैं, जिस काफ़िर पे दम निकले...। ग़ालिब की ये गज़ल ज़िंदा करती...

Bhaskar News Network

May 18, 2019, 08:05 AM IST
Indore News - mp news conversation at a raang number is to change in a tragic ishq quotthe evil of the king quot
मोहब्बत में नहीं है फर्क जीने और मरने का, उसी को देख कर जीते हैं, जिस काफ़िर पे दम निकले...।

ग़ालिब की ये गज़ल ज़िंदा करती है, सआदत हसन मंटो की कहानी के दो किरदारों को। दो अनजान शख्स जो रूहानी इश्क़ की मुकम्मल तस्वीर हैं। एक अनजानी अावाज़ की बादशाहत है, जो दोनों दिलों पर राज करती है। बैचेनी है, जो वक्त के साथ बढ़ रही होती है, और इस कदर बढ़ती है, कि इंतज़ार कतई मंजूर नहीं होता, शायद यही वजह रही कि मोहब्बत का ये अहसास इज़हार तक नहीं पहुंच पाया और बादशाहत खत्म हो गई। मंटो की तमाम खूबसूरत कहानियों के ज़खीरे में से एक कहानी बादशाहत का खात्मा पर प्रयास थ्री डी के कलाकारों ने नाटक खेला। निर्देशन किशोर नाथ ने किया था। कहानी में दो ही किरदार है, िजन्हें शुभम भावसार और हर्षिका परमार ने जीवंत किया।

इश्क़ के खूबसूरत अहसास पर लिखी गई इस कहानी में बदलाव की बहुत ज्यादा गुंजाइश नहीं है, बावजूद इसके नाटक में किए गए कुछ प्रयोग बेहतर हैं, मसलन परदे के पीछे, छाया के रूप में रूबरू होता लड़की का अक्स, बारिश, हार्न और अज़ान की आवाज़ और ग़ालिब की ग़ज़लों का बेहतर इस्तेमाल नाटक को उम्दा बनाता है। हर्षिका और शुभम ने भी अपने किरदारों को निभाने की पूरी कोशिश की।

दो दिलों पर एक अनजान आवाज़ की बादशाहत का अफ़साना कहती है ये कहानी

कहानी ऐसे शख्स की है जो, स्पष्टवादी है और गुलामी उसे कतई पसंद नहीं। यही वजह है कि वो नौकरी नहीं करता और मुंबई के फुटपाथों पर गुज़र करता है। कभी दिन फाके रहकर बीताता है तो कभी कुछ अच्छे दोस्तों की मदद से खाने-पीने का इंतज़ाम हो जाता है। नाम है मनमोहन। इन दिनों मनमोहन को एक दोस्त कुछ दिन के लिए अपना खाली दफ़्तर सौंपकर जाता है, इस वादे के साथ कि वो जल्दी ही आॅफिस के लिए कर्ज का इंतजाम कर लौटेगा। अब मनमोहन दफ्तर में रहने लगता है, वहां रखी एक किताब को बार-बार पढ़कर समय बिताने लगता है। इस बीच अचानक टेलीफोन की रिंग बजती है। एक अनजान लड़की नंबर की मालूमात कर, राॅन्ग नंबर कह फोन रख देती है। मनमोहन भी किताब पढ़ने लगता है। कुछ देर बाद फिर फोन बजता है, और वो लड़की मनमोहन से तआरूफ़ जानने के बाद उसी से बात करने की फरमाइश करती है। एक अनजान लड़की की इस तरह की बात सुन कर मनमोहन सकपका जाता है, लेकिन बाद में संभलकर बात करने लगता है। बातों का सिलिसला शुरू होता है और वो अपनी सारी असलियत लड़की के सामने रखता है। दोनों के बीच बातें होती हैं, और बेशुमार होती है। कभी हंसी तों कभी गुस्सा और कभी गज़ल से वो अनजानी आवाज मनमोहन के दिल पर हुकूमत करने लगती है। फोन का इंतजार और आवाज को सुनने की बैचेनी साफ नजर आती है। यहां न इश्क का इजहार होता है न दोस्ती से इनकार। मनमोहन लड़की का नाम भी नही पूछता। एक दिन अचानक मनमोहन के दोस्त का ख़त आता है। वो बताता है कि कर्ज का इंतजाम कर वो लौट रहा है। तब मनमोहन उस लड़की को बताता है कि अब वो इस ऑफिस से चला जाएगा, यहां उसकी बादशाहत खत्म हो जाएगी। लड़की कहती है, जिस दिन तुम्हारी बादशाहत का आखिरी दिन होगा, मैं तुम्हे अपना नंबर दूंगी। मनमोहन खुश हो जाता है, इस उम्मीद से कि वो लड़की से रूबरू हो पाएगा। दो दिन के लिए लड़की बाहर जाती है, और इस दौरान उनकी बात नहीं हो पाती। मनमोहन फोन के इंतजार में बैचेन होता है, उसकी तबियत बिगड़ती है, और उसकी मौत हो जाती है। बगैर किसी मंजिल पर पहुंचे, कहानी खत्म हो जाती है।

शुभम जायसवाल तो मंच पर दिखे लेकिन हर्षिका परमार की परछाई ही दिखाई गई

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