परम्पराओं व आधुनिकता के बीच का समीकरण पढ़ना सिखाता नाटक

Indore News - हमें अपनी परम्पराओं पर बड़ा नाज होता है। विशेषकर, हमारी कुल परम्पराओं का पालन करना हम अपना धर्म समझते है। आधुनिक...

Jul 14, 2019, 07:50 AM IST
हमें अपनी परम्पराओं पर बड़ा नाज होता है। विशेषकर, हमारी कुल परम्पराओं का पालन करना हम अपना धर्म समझते है। आधुनिक युग में ऐसी कई रवायतों को हम बोझ समझने लगे हैं और आधुनिकता और परम्परा के बीच संतुलन हम नहीं बैठा पा रहे हैं। इसी से जन्मती हैं वो विसंगतियां जिनका गरल समाज में फैलता जा रहा है। सानंद के मंच पर शनिवार को खेला गया नाटक "सोयरे सकळ" परम्पराओं के मांगल्य और आधुनिकता के बीच के इसी समीकरण को पढ़ना सिखाता है। ये नाटक हमें धिक्कारता भी है। आईना भी दिखाता है। मुंबई के भद्रकाली प्रोडक्शन के इस नाटक को महाराष्ट्र में कई पुरस्कार भी प्राप्त हुए हैं।

श्रेष्ठ अभिनय से पैदा होते रसायन को भव्य मंच सज्जा ने और रोमांचकारी बना दिया

कहानी : स्वतंत्रता संग्राम के समय की पृष्ठभूमि है जिसमें महात्मा गांधी की हत्या के बाद का परिदृश्य बताया गया है। एक वकील परिवार है जिसमें पति प|ी और दो बच्चे हैं। परिवार की समाज में ख्याति है और प|ी मां रेणुका की भक्त बताई गई है। 1947 के दंगों में उनका पूरा घर जल जाता है। नौबत ये आ जाती है कि देवी की छोटी सी सोने की मूर्ति गिरवी रखना पड़ जाती है। कुल की परम्परा के ऐसे टूट जाने से घर में उदासी छाई रहती है। माता पिता के निधन के बाद बेटी इस परम्परा का निर्वहन करती है जबकि बेटा अमेरिका निकल जाता है और बाद में उसका बेटा अपनी बुआ के साथ इस परम्परा को आगे बढ़ाता है।

अभिनय : नाटक में दादासाहेब, माई और ताई ये तीन मुख्य किरदार उभरते हैं। अविनाश और ऐश्वर्या नारकर ने अपनी भूमिकाओं के साथ पूरा न्याय किया। विविध किरदारों में आशुतोष गोखले, अश्विनी कसार, आदित्य इंगळे, सुनील ताम्बट, अनुया बैचे ने किरदारों के साथ न्याय किया है।

निर्देशन : डॉ. समीर कुलकर्णी ने नाटक को कसा हुआ लिखा है और निदेशक आदित्य इंगळे ने मंच पर उसे जिस तरह रचा वो काबिले तारीफ है। नेपथ्य आकर्षक और सामयिक है जो इस नाटक की जान है। अजीत परब का संगीत नाटक के रसायन को रोमांचकारी बनाता है।

फोटो : ओपी सोनी

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