उस ख़ामोश शहर में "मैं' खत्म हो जाता है, मृत्यु से परिचय होता है और तब ज़िंदगी के मायने समझ आते हैं : नारंग

Indore News - मन की खुशी क्या है? सुकून क्या है? स्वयं के मायने क्या हैं? ये संसार यात्रा क्या है? सच्चा सुख और जीवन की सार्थकता...

Jul 14, 2019, 07:50 AM IST
Indore News - mp news in that silent city quotiquot gets over introduces death and then understands the meaning of life narang
मन की खुशी क्या है? सुकून क्या है? स्वयं के मायने क्या हैं? ये संसार यात्रा क्या है? सच्चा सुख और जीवन की सार्थकता क्या है? ये सभी वो सवाल हैं, जो गाहे-बगाहे, अकेलेपन में या जीवन के किसी ऐसे क्षण में मन में कौंधते हैं जब व्यक्ति स्वयं से मिलता है। ये सवाल हर शख्स के मन में उठते हैं। इन्हीं सवालों का मन में आन और इन्हें समझने को मैं अवेकनिंग कहता हूं। यदि इन सवालों के जवाब तलाश लिए तो हम जीवन की सब खुशियां पा लेंगे।

रिटायर्ड जजेस एसोसिएशन के सदस्यों से हैप्पीनेस कोच डॉ. गुरमीत नारंग ने "वॉक विद मी टुवर्ड्स सिटी ऑफ सायलेंट' विषय पर ये संवाद किया। इसमें एक सफ़र का ज़िक्र किया। सफर एक ऐसे ख़ामोश शहर का जहां संसार यात्रा को विराम मिलता है।

डॉ. नारंग कहते हैं, सिटी ऑफ साइलेंट ऐसी जगह है, जहां आपके भीतर का "मैं' खत्म होता है। इस संसार में आप और हम महज यात्री हैं, इस सच का आभास होता है। भव्य घरों का मोह छूटता है, और अपना वास्तविक ठिकाना हमें यहां मिलता है। डॉ. नारंग ने ज़िंदगी को एक रात के चार पहर में बांटकर परिभाषित किया। उन्होंने कहा पहला पहर वो होता है जब इंसान मां के गर्भ में होता है। तब वह ध्यान की उच्चतम अवस्था में होता है, और ईश्वर से सीधे सम्पर्क में रहता है। वो प्रार्थना करता है कि उसे इस अंधकार से मुक्त करो, और वचन देता है कि वो संसार में ईश्वर के बताए मार्ग पर ही चलेगा। दूसरे पहर में इंसान मां के गर्भ से निकलकर संसार में आता है। मां-पिता का प्यार पाता है। देने वाले से ज्यादा प्राप्त होने वाली वस्तुओं से प्रेम करता है, और तब इंसान सांसारिक मोह में फंसने लगता है। तीसरे पहर में इंसान शिक्षा, धन प्राप्त करने की सांसारिक दौड़ में दौड़ने लगता है। दिल के बजाय दिमाग से काम करता है, जो कई बार दुख, पीड़ा का कारक बनता है। चौथे पहर में इंसान शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर होने लगता है। आश्रय ढूंढता है। यही पहर होता है जब जीवन में किए गए अपने कर्म इंसान याद करता है। यदि हम अपना जीवन विनम्रता, समर्पण और सबके साथ मिल बांटकर रहते हुए जिएं तो इस संसार से पूर्णता के साथ जाएंगे। ये यात्रा भी सुखद होगी। उन्होंने कहा - मुझे लगता है, जीवन को जानना है, तो उससे पहले मृत्यु को जानना ज़रूरी है। इसलिए अपने बच्चों को मृत्यु से कुछ इस तरह मिलवाइए कि वो उससे डरें नहीं बल्कि उसको समझकर जीवन को बेहतर ढंग से जी सकें।

ईश्वर को खोजना है तो पहले खुद को खोजिए

लोग बरसों ईश्वर को पाने की लालसा में जाने क्या-क्या जतन करते हैं। जबकि यदि ईश्वर को खोजना है तो स्वयं को खोजिए।

यदि जीवन के अंत समय में पछताना नहीं चाहते हो तो प्रेम, करुणा और आनंद का मार्ग अपनाएं।

इस संसार यात्रा में ग्रेव फ़ेस लेकर मत चलिए, सिर्फ मुस्कराइए। हर राह मुस्कराते हुए पार कीजिए।

ऊपरी पहचान, कॅरियर, यादों को पीछे छोड़ देना ही बेहतर है। हर नए दिन को नएपन के साथ देखें।

रिटायर्ड जजेस एसोसिएशन के सदस्यों को संबोधित करते गुरमीत नारंग

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