इंदौर

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बाढ़ पीड़ितों और स्त्री के दु:ख को बयां करती कविता

सिटी रिपोर्टर | उनकी कविताओं में केरल के बाढ़ पीड़ितों का दु:ख-दर्द था तो बेटियों के साथ निरंतर हो रहे अत्याचारों के...

Danik Bhaskar

Sep 11, 2018, 03:36 AM IST
सिटी रिपोर्टर | उनकी कविताओं में केरल के बाढ़ पीड़ितों का दु:ख-दर्द था तो बेटियों के साथ निरंतर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ प्रतिरोध भी था। उनकी कविताएं रोटी के अभाव में भटकते लोगों की पीड़ा भी बयां कर रही थी। ये कविताएं नेहरू पार्क में शहर के कवियों ने सुनाई। अखंड संडे इस मुशायरे में वर्तमान परिवेश में घट रही घटनाओं को छंदमुक्त रचनाओं अभिव्यक्त किया ।

ऐसे में कैसे गाऊं गीत प्रेम के

कवि रामनाथ मालवीय ने कविता सुनाई कि - कैसे गाऊं गीत प्रेम के/जिस देश के बच्चे भूखे हों/हरियाली के मौसम में पेड़ जब सूखे हों/गगन ओढऩा, सड़क बिछौना हवा चले तूफानी/भटक रही है मासूम जवानी/ आशाओं के बांध टूटते और हवेली हंसती हो/तन पर कपड़ा नहीं किसी के/तरस रहे हैं रोटी को/जहां भेडिय़े नोच रहे हो बेटियों को/ ऐसे में कैसे गाऊं गीत प्रेम के। इसमें उन्होंने बाढ़ पीड़ितों और स्त्री पर हो रहे अत्याचार को खूबी से बयां किया। गौरव गागर ने रचना पढ़ी : पाई पाई की कीमत मालूम हो गई/जब कमाने निकले अपने पैरों पर पंक्तियां भी सराही गई । पंकज जैन ने शेर सुनाए : निगाहों का कहा हमेशा सच्चा नहीं होता/हर खूबसूरत शख्स अंदर से अच्छा नहीं होता, जि़ंदगी जब दर्द से रूला देती है / तब वो मेरे ज़ख्मों की दवा देती है।

धूप, धुएं, धूल के बदले सोचो वो तुम्हें क्या देगा?

अशफाक हुसैन तंज किया कि खुद बैठे महलों में भगवान को बिठाया सड़कों पर/ धूप, धुएं, धूल के बदले सोचो वो तुम्हें क्या देगा? मुकेश इन्दौरी ने ग़ज़ल सुनाई : अपनी किस्मत की लकीरों को इशारा न मिला/ कोई जुगनू कोई मोती कोई तारा न मिला/जिनका बचपन गुज़रा था मेरी बांहों में कभी/इस बुढ़ापे में मुझे उनका सहारा न मिला। कुसुम मंडलोई ने मालवी लोकगीत आनंद भयो नंद घरे बधाई गीत गाई। राधेश्याम यादव, अनूप सहर , मदनलाल अग्रवाल, वीर छाबड़ा, रामआसरे पांडे, रमेश धवन, श्याम बाघौरा, हरि यादव, जितेन्द्र शिवहरे, राहुल मिश्रा, आदि ने भी सुहानी शाम को काव्यमयी बनाया। संचालन मुकेश इंदौरी ने किया। आभार दिनेशचंद्र तिवारी ने माना ।

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