इंदौर

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GST पर हर 15 दिन में जारी हो एफएक्यू, वसूली पर ब्याज की दर 24% से घटाकर 15% की जाए

इंदौर में कर सलाहकारों ने जीएसटी काउंसिल के विशेष सचिव को बताई समस्या और दिए सुझाव।

Dainik Bhaskar

Jun 11, 2018, 08:09 PM IST
Problems told to GST Council Secretary

इंदौर। मप्र टैक्स लॉ बार एसोसिएशन और कमर्शियल टैक्स प्रैक्टिशनर्स एसोेसिएशन द्वारा सोमवार को जीएसटी की चुनौतियां एवं समाधान विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में जीएसटी काउंसिल के विशेष सचिव अरुण गोयल मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे। संगोष्ठी का उद्देश्य जीएसटी कानून में विसंगतियां व पोर्टल पर आ रही तकनीकी समस्याओं व व्यवहारिक कठिनाइयों से जीएसटी काउंसिल को अवगत कराना था। जीएसटी काउंसिल के विशेष सचिव ने जीएसटी पोर्टल पर आ रही समस्याओं को काउंसिल की बैठक में रहने का आश्वासन दिया। कार्यक्रम के दैरान पेश मेमोरंडम में निम्न समस्याओं एवं उसके उपाय पेश किए गए।

- एक्ट, नियम आदि से सम्बंधित समस्याएं व सुझाव


समस्या : जीएसटी के वर्तमान नियम में कंपोजीशन स्कीम लेने की पात्रता सिर्फ उन करदाताओं को है जो या तो वस्तुओं में काम कर रहे हैं अथवा निर्माता है अगर वह किसी भी प्रकार की सेवा की थोड़ी सी भी सप्लाई का कार्य कर रहे हैं ,तो उनकी यह पात्रता खत्म मानी जाएगी। इसके साथ ही जीएसटी के नियम में ब्याज की आय को कर मुक्त सेवा माना गया है अर्थात अगर कंपोजीशन डीलर के पास नाम मात्र की भी ब्याज जैसी आय आ रही है अथवा किसी स्थाई संपत्ति से थोड़ा भी किराया आ रहा है तो ऐसी दशा में वह कंपोजीशन की पात्रता से बाहर हो जाएगा।

सुझाव : इस नियम को थोड़ा सा सरल करने की आवश्यकता है, काउंसिल ने भी अपनी एक मीटिंग के तहत यह तय किया था कि किसी भी डीलर को 500000 तक की सेवा प्रदान करने पर कंपोजीशन की भी पात्रता रहेगी परंतु उस संबंध में कोई नोटिफिकेशन अभी तक जारी नहीं किया गया।

समस्या : काउंसिल की एक मीटिंग में तय किया गया था कि कंपोजीशन के लिए टर्न ओवर की सीमा को 1 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 1.50 करोड़ तक किया जाएगा, परंतु अभी तक कोई अधिसूचना जारी नहीं की गई है और कई व्यापारी प्रेस रिलीज में आई इस जानकारी के आधार पर डेढ़ करोड़ तक कंपोजीशन स्कीम में ही अपने आप को मान रहे हैं ,यह भ्रम वाली स्थिति है इस पर संशय बना हुआ है।

सुझाव : काउंसिल के निर्णय अनुसार कानून में जरूरी बदलाव किए जाने चाहिए। तथा कंपोजीशन स्कीम के अंतर्गत वस्तु के अलावा सेवाओं के संबंध में भी छोटे करदाताओं को शामिल कराया जाना चाहिए।

समस्या : अधिनियम की धारा 10 के तहत वस्तुओं के संबंध में सप्लाई की जगह वहां मानी जाती है जहां पर वस्तुओं को डिलीवर किया गया है ऐसी दशा में एक व्यापारी द्वारा दूसरे राज्य में जाकर वस्तु खरीद कर लाने पर उसी प्रदेश का टैक्स आरोपित होता है जिस की छूट वह व्यापारी अपने राज्य में आकर नहीं ले सकेगा।

सुझाव : कानून के प्रावधान में जरूरी बदलाव करके किसी भी व्यापारी द्वारा कहीं से भी माल लिए जाने पर आरोपित कर इनपुट टैक्स क्रेडिट लेने की पात्रता दी जानी चाहिए।

समस्या : वर्तमान नियम के अनुसार वारंटी पीरियड में इस्तेमाल किए जाने वाले सामान के संबंध में टैक्स अदा करने की जवाबदारी होती है।
सुझाव : एक व्यापारी द्वारा वारंटी में इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं की लागत को वह अपने बेचने की कीमत में पहले ही शामिल कर चुका होता है बाद में उसे सप्लाई मानते हुए वापस से टैक्स लेना न्याय उचित नहीं है, इस नियम में सुधार की अत्यंत आवश्यकता है।


समस्या : अधिनियम की धारा 17 के अनुसार अगर कोई वस्तु उपयोग/उपभोग के दौरान खत्म हो जाती है अथवा खराब हो जाती है तो उससे संबंधित टेक्स्ट क्रेडिट वापस करनी होती है ,जबकि एक व्यापारी द्वारा ऐसे नुकसान को ध्यान में रखते हुए ही अन्य वस्तु की कीमत तय की जाती है।

सुझाव : इस तरह का नुकसान व्यापार के अंतर्गत होता है, अतः उसकी इनपुट टैक्स क्रेडिट दी जानी चाहिए।


समस्या : वर्तमान नियम में अगर एक व्यापारी द्वारा अन्य व्यापारी को बिल की तारीख से 6 माह के अंदर भुगतान नहीं किया जाता है तो उस पर लिए गए कर की क्रेडिट को सरकार को वापस करना होगा तथा 18% की दर से ब्याज भी देना होगा यह प्रणाली न्यायोचित नहीं है क्योंकि एक व्यापारी द्वारा दूसरे व्यापारी का भुगतान ना करने पर सरकार का कोई कर का नुकसान नहीं हो रहा है।

सुझाव : इस तरह के प्रावधान नीति संगत नहीं है और इसमें तुरंत बदलाव आवश्यक है।

समस्या : जीएसटी के मूल कानून में विभिन्न रिटर्न में हुई त्रुटि को सुधार करने की व्यवस्था है परंतु वैकल्पिक रूप से सरकार द्वारा लाई गई व्यवस्था फॉर्म 3बी में सुधार के कोई प्रावधान नहीं है इसके चलते व्यापारी को ब्याज और पैनल्टी का भुगतान करना पड़ रहा है।👇
सुझाव : मानवीय त्रुटि को सुधार करने की व्यवस्था होनी चाहिए, यह सबका मौलिक अधिकार है ।


समस्या : जीएसटी कानून के अंतर्गत अगर कोई भी नियत तिथि को रविवार अथवा छुट्टी है तो भी उससे संबंधित फाइलिंग उसी दिन करना अनिवार्य होता है।
सुझाव : अगर अंतिम तिथि छुट्टी की तारीख है तो जनरल क्लाज एक्ट 1897 के तहत अगले कार्य दिवस को माना जाता है यह प्रावधान जीएसटी कानून में भी जनहित में शामिल किया जाना अति आवश्य है ।


समस्या : 10 नियम की धारा 129 और 130 की कार्रवाई छोटी-छोटी भूलों गलतियों के संबंध में की जा रही है इन कार्रवाई के फलस्वरूप व्यापारी को वस्तु की कीमत से अधिक की कीमत की दंडात्मक कार्यवाही हो सकती है।
सुझाव : कानून का उद्देश्य टैक्स आरोपित करना और वसूलना है नाकी पेनल्टी अतः कम से कम पहले 2 वर्षों में ऐसी भारी दंडात्मक कार्यवाही ना कर के व्यापारी को भी कानून समझने का मौका देना चाहिए।


समस्या : अधिनियम की धारा 126 के तहत सिर्फ 5000 तक की दंड को छोड़ने तक का प्रावधान है यह सीमा बहुत कम है।
सुझाव : इस प्रावधान में मौद्रिक सीमा के बजाय छोटे व्यापारी जिनका टर्नओवर पासपोर्ट के अंदर है उनके द्वारा की गई भूलों की पेनल्टी माफ करने का प्रावधान जोड़ा जाना चाहिए।


समस्या : वर्तमान नियमानुसार अगर गलत टैक्स जमा किया जाता है तो पहले सही टैक्स जमा करना होगा और गलत टैक्स का रिफंड लेना होगा इस नियम के चलते व्यापार की बड़ी पूंजी इन बातों में लगी रहेगी जिससे व्यापार प्रभावित होगा।
सुझाव : नियम में बदलाव की आवश्यकता है तथा त्रुटि को सहीं करते हुए सहीं टैक्स में हस्तांतरण करने की व्यवस्था होनी चाहिए।


समस्या : एसईजेड के संबंध में कई विसंगतियां हैं तथा व्यापार बड़े रूप से प्रभावित हो रहा है।👇
सुझाव : एक उच्च स्तरीय कमेटी का गठन होना चाहिए जो जमीनी वस्तुस्थिति को समझ सके और काउंसिल को उचित बदलाव करने की अनुशंसा करें।


समस्या : अगर एक व्यापारी अन्य राज्य में जाकर खरीदी करता है तथा होटल में ठहरता है तो पोर्टल के किराए पर उसी राज्य का कर लगता है जिसकी छूट वह व्यापारी नहीं ले सकेगा जबकि उसी राज्य का व्यापारी ऐसा खर्चा करता है तो उस टैक्स की छूट नही मिले, कानून के अंतर्गत इस तरह का असमान व्यवहार असंवैधानिक है तथा सरकार का नारा एक देश एक बाजार एक टैक्स अप्रासंगिक हो रहा है।
सुझाव : इस व्यवस्था में सभी को समान अवसर नियम के आधार पर बदलाव अति आवश्यक है।


समस्या : प्रॉपर्टी व्यवसाय से संबंधित कानून में फर्स्ट ऑक्यूपेशन जैसी शब्दावली का प्रयोग किया गया है जिसकी विस्तृत व्याख्या नहीं की गई है तथा अगर कोई बुकिंग कैंसिल होती है तो धारा 34 के तहत क्रेडिट नोट बनाना संभव नहीं है, इसके अलावा धारा 34 का नियम क्रेडिट नोट बनाने की समय सीमा वर्ष खत्म होने के बाद सिर्फ 6 महीने तक देता है जो कि प्रॉपर्टी बाजार में बहुत कम है क्योंकि एक प्रोजेक्ट सालों तक चलता है और बुकिंग कई बार काफी देर बाद भी कैंसिल होती है।
सुझाव : सरकार को इन भ्रांतियों को दूर करते हुए फर्स्ट ऑक्यूपेशन शब्दावली का विस्तृत विवरण जारी करना चाहिए तथा प्रॉपर्टी बाजार के संबंध में धारा 34 के अंतर्गत क्रेडिट नोट की व्यवस्था कथा समय सीमा बढ़ाई जानी चाहिए।


समस्या : जीएसटी कानून के अंतर्गत निर्धारित शैक्षणिक पात्रता के अलावा प्राधिकृत प्रतिनिधि के रूप में काम करने के लिए 30 जून तक एक परीक्षा पास करने की आवश्यकता है, जबकि अभी तक इसका पाठ्यक्रम और परीक्षा की जानकारी सार्वजनिक नहीं हो पाई है जो प्रतिनिधि पूर्व अप्रत्यक्ष कर कानूनों के अधीन एनरोल्ड होकर की वर्षो से कार्य कर रहे हैं उन्के लिए यह अनिवार्यता अनुचित है।
सुझाव : पहले से पिछले कानून में अधिकृत प्रतिनिधियों को इस परीक्षा की अनिवार्यता नही होकर इससे आवश्यक छूट होनी चाहिए अन्य के लिए यह समय सीमा और 1 साल से बढ़ाने की आवश्यकता है।


समस्या : जीएसटी कानून के अंदर कार्यवाही कब से शुरू हो चुकी है परंतु अपील करने की पूर्ण व्यवस्था अब चालू हो पाई है कानून में अपील दायर करने की समय सीमा 4 माह की दी गई है।
सुझाव : सरकार द्वारा देरी होने की वजह से अपील करने की समय सीमा में बढ़ोतरी होनी चाहिए और जब तक अपील का निराकरण ना हो करदाता के विरुद्ध कोई दंडात्मक कार्यवाही नहीं की जानी चाहिए।


समस्या : वसूली पर ब्याज की दर 24% तथा रिफंड समय पर ना दिए जाने पर देरी पर 6% की दर से ब्याज देने का प्रावधान है यह न्याय उचित नहीं है क्योंकि ब्याज के अलावा पेनल्टी व जब्ती जैसी अन्य कार्यवाही अलग से की जाती है।
सुझाव : पिछले कानून तथा वर्तमान अर्थव्यवस्था की स्थिति को देखते हुए हुए यह ब्याज दर बहुत ज्यादा है इसे अधिकतम 15% किया जाना चाहिए।


समस्या : जीएसटी कानून में सेवाओं के संबंध में कई शब्दावली को परिभाषित नहीं किया है जिसके चलते काफी भ्रम है तथा भविष्य में विवाद होंगे।
सुझाव : सरकार को एक एक्सपर्ट कमेटी बनाकर ऐसी सभी शब्दावली को परिभाषित कर देना चाहिए अन्यथा यह भी तय किया जा सकता है कि जो शब्द पिछले कानून में परिभाषित थे परंतु इस अधिनियम में परिभाषित नहीं किए गए हैं उनका अर्थ इस कानून में भी वही निकाला जाएगा।


समस्या : व्यापारी द्वारा कानून अथवा रिटर्न भरने से संबंधित आ रही मुश्किलों के संबंध में सरकार द्वारा स्थापित हेल्प डेस्क जवाब नहीं दे पा रही हैं तथा इससे सरकार की छवि धूमिल हो रही है।

सुझाव : सरकार को राज्य स्तर पर कानून के जानकारों को साथ में रखते हुए हेल्पडेस्क स्थापित करना चाहिए तथा हर 15 दिन में जनहित में एफएक्यू जारी करनी चाहिए।

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