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नीति आयोग के नवाचार से राज्य शिक्षा केंद्र बेखबर, दो करोड़ रुपए फिजूल खर्च कर दिए

इंदौर/भोपाल

Dainik Bhaskar

Nov 08, 2018, 03:36 AM IST
Indore - with the innovation of the policy commission the state education center unnecessary spent two crore rupees at a disadvantage
इंदौर/भोपाल
नीति आयोग ने देश भर में मिडिल और प्राइमरी शिक्षा का स्तर जांचने के लिए एक सर्वे कराया था। इसमेंे देश भर के 115 जिले पिछड़े पाए गए। इन कमजोर जिलों को महत्वाकांक्षी जिले माना गया। इनमें मप्र के विदिशा, राजगढ़, खंडवा, बड़वानी, छतरपुर, गुना, सिंगरौली और दमोह आठ जिले शामिल हैं। इन्हें एक योजना में सम्मिलित किया गया। साथ ही तय किया कि इन जिलों के सरकारी स्कूलों का उन्नयन किया जाए। यहां तक तो सब ठीक-ठाक रहा, लेकिन उन्नयन के नाम पर जो काम किए जा रहे हैं, उस पर सवाल उठने लगे हैं।

स्कूल शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले कुछ एनजीओ कार्यकर्ताओं ने नीति आयोग के नवाचार पर प्रश्न खड़े किए हैं। इन पिछड़े जिलों को अग्रणी बनाने के लिए बगैर हल्ले के काम तो शुरू कर दिया, लेकिन ये जिले पिछड़े क्यों रह गए? इसको लेकर कोई पूछताछ नहीं की गई। शिकायतकर्ताओं ने बताया कि प्रदेश के प्रत्येक जिले में छात्रों की संख्या बढ़ाने के लिए कई नवाचार किए गए। इनमें खेल-खेल में शिक्षा, दीवारों पर चित्र उकेरना और जन-जागृति के लिए नुक्कड़ नाटक आदि शामिल हैं। यह हाल तब हैं, जब केवल स्कूल शिक्षा विभाग को राज्य सरकार ने 32 हजार करोड़ रुपए से अधिक राशि आवंटित की है। इसमें स्कूलों के उन्नयन के लिए बड़ी राशि शामिल है। फिर भी ये जिले पिछड़े की श्रेणी में हैं। इसके लिए अधिकारियों और कर्मचारियों की जवाबदेही तय करने के बजाय विभाग ने करोड़ों रुपए खर्च करना शुरू कर दिए।

मप्र के 2996 स्कूलों के लिए 2.12 करोड़ रुपए आयोग ने दिए हैं। इसे सकारात्मक एड कैंपेन नाम दिया गया है। इस अभियान के बारे में राज्य शिक्षा केंद्र को कोई जानकारी नहीं है। सीधे कलेक्टर के माध्यम से यह काम कराया जा रहा है। वह भी विस चुनाव आचार संहिता के दौरान। इस बारे में नीति आयोग के एक सलाहकार से संपर्क करने की कोशिश की लेकिन उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं आया। इस मामले में नीति आयोग के उपाध्यक्ष से भी डीबी स्टार ने बात करनी चाही, मगर वे भी उपलब्ध नहीं हो सके।

वह तो केंद्र सरकार का प्रोजेक्ट है

 भारत सरकार ने सर्वे में उनके मापदंड फिक्स किए थे और उसी हिसाब से प्रदेश के आठ जिलों को महत्वाकांक्षी योजना में शामिल किया गया। यदि हम सर्वे करवाते तो परिणाम का रिव्यू भी करते। हमें उनके बारे में कोई जानकारी नहीं है। हमारी स्कीम पूर्व की भांति संचालित होती रहेंगी। ओएल मंडलोई, एडिशनल डायरेक्टर, राज्य शिक्षा केंद्र

जिम्मेदारी तय होना चाहिए

 हम एनजीओ के माध्यम से 100 से अधिक स्कूलों में काम कर चुके हैं और एक रुपए राशि नहीं ली। आगे भी नहीं लेंगे, लेकिन सरकारी धन का दुरुपयोग रुकना चाहिए। कई साल से हम देख रहे हैं कि हर बार कोई नया प्रोजेक्ट आता है और उस पर करोड़ों रुपए खर्च किए जाते हैं। नतीजा कुछ नहीं निकलता है। मैं केंद्र सरकार को शिकायत करूंगा कि एमपी के जिलों के पिछड़ेपन के लिए कौन जिम्मेदार है और उसके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की? मनोहर लौवंशी, एनजीओ कार्यकर्ता एवं शिकायतकर्ता

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