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हां, तलाशना होगी ख़ुशी, ढूंढो उसे प्रकृति के रंगों में, माता-पिता की हंसी में, खुद में

वर्ल्ड सुसाइड प्रिवेंशन डे पर सोमवार कासे शहर में कुछ अच्छी एक्टिविटीज़ हुईं। स्पंदन ने इंटरस्कूल डिबेट...

Dainik Bhaskar

Sep 11, 2018, 03:40 AM IST
Indore - हां, तलाशना होगी ख़ुशी, ढूंढो उसे प्रकृति के रंगों में, माता-पिता की हंसी में, खुद में
वर्ल्ड सुसाइड प्रिवेंशन डे पर सोमवार कासे शहर में कुछ अच्छी एक्टिविटीज़ हुईं। स्पंदन ने इंटरस्कूल डिबेट कॉम्पीटिशन कराई। विषय था “खुशी ढूंढने के लिए (खुश रहने के लिए) प्रयास करना ज़रूरी है। स्टूडेंट्स तैयारी से आए। कुछ ने हिंदी तो कुछ ने अंग्रेज़ी में अपनी बेबाक राय रखी। एक और एक्टिविटी की सोशल इश्यूज़ पर लगातार बात करने वाले मानस दवलानी के ग्रुप ने। सुसाइड रोकेने के लिए दुनिया के कई देशों में लोग घर की खिड़कियों में एक दीया या कैंडल जलाकर रखते हैं। मक़सद यह है कि जो मुश्किलों से हारकर जीवन समाप्त कर रहे हैं, उन्हें ये रोशनी के क़तरे जीने की एक और उम्मीद दें। शहर के कुछ घरों के झरोखे शाम को रोशन दिखाई दिए। डिबेट में बच्चों ने जो कहा वो पढ़िए :

पक्ष : खुशी ढूंढना के प्रयास करना ज़रूरी

n मैं अपनी मां के साथ कहीं जा रही थी। मैं मां से अच्छे स्कूल शूज़ न दिलाने के लिए ऐंठी हुई थी। मैंने देखा एक बच्चा जिसके पैर नहीं थे वो सड़क किनारे भीख मांग रही था। दोस्तों के साथ खेल रहा था। खिलखिला रहा था। और मैं अच्छे जूते न होने की शिकायत लिए आंसू बहा रही थी। इसी वजह से मां भी चिढ़ी हुई थीं। नेगेटिव थॉट्स नेगेटिविटी को ही अट्रैक्ट करते हैं।

नकारात्मकता कैंसर सेल्स् की तरह। निकालेंगे नहीं जो भी अच्छा है वो खत्म हो जाएगा। प्रयास नहीं करेंगे तो खुशी नहीं मिलेगी। जो काम खुशी देता है उसे पूरे दिल से करना चाहिए।

बुद्ध ने कहा था हर शय की तरह खुशी भी टेम्पररी है। ऑप्टिमिस्टिक लोगों को भी नेगेटिव थॉट्स आते हैं। परफेक्ट हैप्पीनेस स्मृतियों में भी नहीं रहती।

ऐसे पल आएंगे जब अकेलापन अंधेरा और नैराश्य घेरेगा। ऐसे में हां ढूंढना पड़ेगी खुशी। डब्ल्यूएचओ की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक 36 फीसदी इंडियंस डिप्रेशन में हैं। जब हम तूफान का रुख न मोड़ सकें तो हमें बदलाव को समझते हुए चलकर मंजिल पाना चाहिए। रॉन्डा बर्न की किताब है द सीक्रेट। इसमें लिखा है कि हमारे विचार हमारी हमारे अनुभवों को आकार देते हैं। हम अपनी बगिया में फूलवाले पौधे लगाना चाहेंगे या कांटे। यह भी कॉन्शियस हैप्पीनेस है। तो फिर इससे परहेज़ क्यों।

तनाव चिंता और समस्या के ताले पड़ गए हैं मनुष्य की खुशी पर। ऐसे में एक ही उपाय है कि खुशी को तलाशा जाए। प्रकृति के रंगों में, माता पिता की हंसी में। खुशी इस पर निर्भर करती है कि आप क्या सोचते हैं। स्थितियों को अपने अनुरूप ढालना ज़रूरी है।

विपक्ष : खुशदिली ख़रीदी नहीं जा सकती, ये नैसर्गिक भाव है

प्रतिभागी मंच पर आकर ठहाके लगाती है। सब हैरान थे। वो कहती है कुछ ऐसार ही शोर हम मोहल्लों में बने लाफ्टर क्लब्स में सुनते हैं। कभी ग़ौर से सुनिए। इन ठहाकों के पीछे गहरा रुदन, क्रंदन सुनाई देगा। अकेलापन दिखाई देगा।

सायकोलॉजी में सिद्ध किया गया है कि जितना हम खुशियां तलाशने की कोशिश करते हैं, उतने ही हम नाखुश हो जाते हैं। क्या आपने कभी बच्चों को यूं नकली हंसी हंसते देखा है। नहीं, क्योंकि बच्चे दिखावटी नहीं होते। लेकिन धीरे धीरे वो भी नैराश्य के घेरे में आ जाते हैं। नैसर्गिक खुशी ही जीवन का उद्देश्य है।

खुशदिली खरीदी नहीं जा सकती। टीवी देखना, फिल्म देखना प्लेज़र है। खुश होने के प्रयास हैं। खुशी नहीं। खुशी तो अंदर से आती है। पॉज़ीटिव नेगेटिव इमोशंस आर हेल्दी एंड नेसेसरी। बी योरसेल्फ, लव योरसेल्फ़।

खुशी कोई इंसान या चीज़ है क्या? यह भाव है जो मन में उत्पन्न होता है।

खुशी वहां जहां आत्मसम्मान है। जहां ज्ञान, वाणी और विचार पूर्ण रूप से स्वतंत्र है।

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