जबलपुर

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पोषण आहार मामला : हाईकोर्ट ने तीनों कंपनियों को दिखाया बाहर का रास्ता

हाईकोर्ट ने पोषण आहार सप्लाई जारी रखने के लिए सरकार को शॉर्ट टर्म टेंडर बुलाने की अनुमति दे दी।

Danik Bhaskar

Mar 15, 2018, 06:02 AM IST

जबलपुर/भोपाल. आंगनबाड़ियों में पोषण आहार के बहुचर्चित मामले में हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस विजय शुक्ला की खंडपीठ में विभिन्न याचिकाओं पर बुधवार को पहली सुनवाई में एमपी स्टेट एग्रो की ज्वाइंट वेंचर वाली तीनों निजी कंपनियों को शॉर्ट टर्म टेंडर की प्रक्रिया में भाग लेने से अयोग्य करार दिया। हाईकोर्ट ने पोषण आहार सप्लाई जारी रखने के लिए सरकार को शॉर्ट टर्म टेंडर बुलाने की अनुमति दे दी। इसके साथ ही इंदौर हाईकोर्ट में जस्टिस पीके जायसवाल की खंडपीठ द्वारा 27 फरवरी और 13 मार्च 2018 के स्टे पर रोक लगा दी है। अगली सुनवाई 27 मार्च को होगी।

सरकार ने बताया- नई व्यवस्था में प्राइवेट प्लेयर नहीं होंगे

हाईकोर्ट ने 40 मिनट की सुनवाई में सरकार से पूछा कि एमपी स्टेट एग्रो के साथ ज्वाइंट वेंचर वाली तीनों कंपनियां कौन हैं? महाधिवक्ता पुरुषेंद्र कौरव ने तीनों के नाम बताए। इसके बाद कोर्ट ने कहा कि ये तीनों ही शॉर्ट टर्म टेंडर प्रक्रिया से बाहर रहेंगी। कोर्ट ने कहा कि 13 सितंबर 2017 के इंदौर हाईकोर्ट के जस्टिस एससी शर्मा और जस्टिस आलोक वर्मा का फैसला सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन, केंद्र सरकार के दिशा-निर्देश और नेशनल फूड सिक्योरिटी एक्ट के मुताबिक है। सरकार को इसी के अनुरूप पोषण आहार की प्रक्रिया तय करनी चाहिए। पब्लिक यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज पीयूसीएल के वकील सिद्धार्थ सेठ ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन पोषण आहार प्रक्रिया के विकेंद्रीकरण की है। ठेकेदारों की भूमिका नहीं होनी चाहिए। यह काम महिलाओं के स्व-सहायता समूहों को ही दिया जाना चाहिए। महाधिवक्ता ने बताया कि कैबिनेट ने निर्णय लिया है कि सरकार प्रदेश में 7 स्थानों पर प्लांट लगाएगी। किसी भी प्रायवेट प्लेयर को शामिल नहीं किया जाएगा। इस प्रक्रिया में कुछ समय लगेगा। तब तक शॉर्ट टर्म टेंडर के जरिए आहार सप्लाई का काम जारी रखेंगे।

ये तीन कंपनियां

1. एमपी एग्रो न्यूट्री फूड प्रा. लि.
2. एमपी एग्रो इंडस्ट्री
3. एमपी एग्रोटॉनिक्स लिमिटेड

...और ये अफसर जो 12 साल से भोपाल में ही डटे

जुलाई 2016 में आयकर विभाग के छापे के बावजूद एमपी स्टेट एग्रो के जीएम रवींद्र चतुर्वेदी और वेंकटेश धवल का बाल बांका नहीं हुआ। धवल को रिटायरमेंट के बाद संविदा नियुक्ति मिल गई। महिला एवं बाल विकास विभाग में आईसीडीएस के तहत पोषण आहार के नेटवर्क में बरसों से काबिज अफसरों को अगस्त 2016 में यह घोटाला उजागर होने के बाद पद से हटाया गया था। मगर सबको भोपाल में ही दूसरी अहम जिम्मेदारियां दे दी गईं। 2010 से ज्वाइंट डायरेक्टर रहे अक्षय श्रीवास्तव को पहले महिला सशक्तिकरण में भेजा गया। अब वे महिला आयोग में जमे हैं। उनके खिलाफ पहले से कई शिकायतें थीं। उनके पहले रवींद्र रघुवंशी आठ साल तक यहां काबिज थे, जो अरविंद जोशी-टीनू जोशी के यहां आयकर विभाग के छापे के बाद हटा दिए गए थे। सबसे अहम आठ सीडीपीओ 15 साल से यहीं जमे हैं, जबकि इन सबको फील्ड में होना चाहिए। क्वालिटी चैक के लिए तैनात दो में से एक ही अफसर को हटाया गया मगर कोई भोपाल से बाहर नहीं गया।


ऐसे बढ़ता गया मासूमों के मौत का आंकड़ा


- 1 जनवरी 2016 से 31 जनवरी 2017 -396 दिन
: 5 वर्ष तक के मृत बच्चों की संख्या 28948
: 6 से 12 वर्ष तक के मृत बच्चों की संख्या 462
औसत 74 बच्चों की मृत्यु प्रतिदिन
2- अप्रैल 2017 से सितंबर 2017 - यानी 183 दिन
: 183 दिन में 16898 बच्चों की मृत्यु
औसत प्रतिदिन - 92 बच्चों की मृत्यु
- इन सभी बच्चों की कुपोषण, डायरिया, मलेरिया समेत अन्य बीमारियों से मृत्यु हुई।
3- बीते दस सालों में सिर्फ बच्चों का कुपोषण मिटाने के लिए पोषक तत्व युक्त टॉनिक्स और न्यूट्रीशियन की खरीदी पर 4800 करोड़ रुपए खर्च हुए।

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