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जिस महिला के घर राहुल गांधी रुके थे, आज वह अपनी पहचान को तरस रही

Dainik Bhaskar

Dec 13, 2017, 08:11 AM IST

15 अप्रैल 2008 को उस समय देश में चर्चित हो गया था, जब राहुल गांधी रात करीब दस बजे यहां पहुंचे थे।

The lady whose house was stopped by Rahul Gandhi

जबलपुर.  साढ़े तीन सौ की आबादी वाला आदिवासी बाहुल्य ग्राम बैसा टपरियन। टीकमगढ़ जिले के बल्देवगढ़ ब्लॉक का यह छोटा-सा गांव 15 अप्रैल 2008 को उस समय देश में चर्चित हो गया था, जब राहुल गांधी रात करीब दस बजे यहां पहुंचे थे। बिना किसी को (शासन-प्रशासन क्या प्रदेश कांग्रेस भी) बताये, अपने युवा साथी सचिन पायलट के साथ राहुल गांव की हल्की बाई सोर के घर पहुंचे थे। पूरी रात गांव वालों के साथ सूखे के हालातों, समस्याओं आदि पर चर्चा करते रहे।

 

- बुंदेलखण्ड के हालातों को समझते रहे और पौ फटने के पहले ही जतारा की ओर से जिस कच्चे रास्ते से आए थे, उसी रास्ते रवाना भी हो गए।  जाने से पहले राहुल ने गांव वालों को आदिवासियों की समस्याओं को हल करने व बुंदेलखंड की तस्वीर बदलने का भरोसा दिलाया।

- इस पर सबने यकीन किया, क्योंकि उस समय केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। राहुल गांधी के यहां से जाते ही बुंदेलखंड को 7200 करोड़ का पैकेज मिला, जिसमें से मप्र के  हिस्से में आए 3600 करोड़ रुपए।   मिले पैसों में हुए घोटालों व निर्माण तथा विकास कार्य में हुई धांधलियों के बीच वह हल्की बाई आज भी पक्के आवास को तरस रही है, जिसके घर राहुल व सचिन रुके थे। उसके हाथों की बनी रोटी और आलू की सब्जी खाई थी। 


सूची में है नाम फिर भी

 ग्राम पंचायत बैसा में 320 प्रधानमंत्री आवास बनने हैं। आवासहीनों की बनी सूची में हल्की बाई का भी नाम है। पहले चरण में 64 आवास बनने थे। 63 बन गये, केवल हल्की बाई का आवास नहीं बना। क्योंकि उसके नाम के आगे पहचान संदिग्ध लिखा हुआ है। सरपंच ऊषा सोनू तिवारी के मुताबिक हल्की बाई के पिता का नाम सबसे पूछा। हल्की बाई के बेटे से भी, लेकिन किसी ने नहीं बताया। दुखद पहलू यह है कि सरपंच-सचिव ने हल्की बाई से कभी भी उसके पिता का नाम नहीं पूछा। 
नत बहू संभाले है घर को

हल्की बाई का बेटा गांव के बाहर बैसा स्कूल के पास बने पक्के मकान में अपनी पत्नी व बच्चों के साथ रहता है। उसका कहना है कि अम्मा साथ नहीं रहना चाहती हैं। ग्राम टपरिया की जिस झोपड़ी में राहुल आए थे, आज भी वह उसी हाल में है। इस घोपड़ी में हल्की बाई अपनी नत बहू और उसके परिवार को आश्रय दिये हुए है। पेंशन में वाले तीन सौ रुपए और हर माह मिलने वाला पांच किलो अनाज उसे नाकाफी लगता है। इसलिये वह गांव के दूसरे लोगों के खेत पर काम करती है। वहीं से भाजी-तरकारी तोड़ लाती है। बाकी का खर्च दिहाड़ी की मजदूरी करने वाला, उसका नाती उठाता है, जिसके बूते रोज घर का चूल्हा जलता है।

 

सरकारी कागजों में पहचान खोई 

 

- सुर्खियां बनने वाली हल्की बाई को आज भी पूरा गांव जानता है। ग्राम पंचायत बैसा के सरपंच से लेकर जिले का हर आम और खास उसके नाम से परिचित हैं। बावजूद इसके सरकारी कागजों में यह नहीं माना जा रहा है कि हल्की बाई, अमना सोर की पुत्री हैं। चूंकि सरकारी कागजों में हल्की बाई के पिता का नाम दर्ज नहीं है, इसलिये उसे न तो इंदिरा और न ही राजीव व प्रधानमंत्री आवास का ही लाभ मिला।

 

उम्मीद है दोबारा आएंगे राहुल गांधी
- सत्तर साल की हल्की बाई के जेहन में आज भी उस रात की कुछ बातें ताजा हैं। राहुल गांधी का कांग्रेस अध्यक्ष बनना हल्की बाई के लिये खुशखबरी से कम नहीं है। पांच दिन पहले गांव के कुछ लोगों ने उसे बताया कि तुम्हारे घर आने वाले राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष बनने वाले हैं।

- मंगलवार को कुछ कांग्रेसियों ने उसके घर पहुंचकर मुंह भी मीठा कराया। हल्की बाई को उम्मीद है कि राहुल एक बार फिर उसके घर आएंगे और उससे तथा गांव वालों से यह जरूर पूछेंगे कि कितना काम हुआ। कितनी राहत मिली। कितना विकास हुआ। 

 

 

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