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लोकसभा चुनाव / संस्कारधानी जबलपुर में राकेश सिंह के सामने सीट बचाने की चुनौती, विवेक तन्खा फिर से लगाएंगे जोर



जबलपुर में कांग्रेस प्रत्याशी विवेक तन्खा और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह आमने-सामने। जबलपुर में कांग्रेस प्रत्याशी विवेक तन्खा और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह आमने-सामने।
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जबलपुर में कांग्रेस प्रत्याशी विवेक तन्खा और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह आमने-सामने।जबलपुर में कांग्रेस प्रत्याशी विवेक तन्खा और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह आमने-सामने।

  • जनता पार्टी की लहर में शरद यादव ने 1977 में कांग्रेस के गढ़ को ढहा दिया था
  • भाजपा लगातार 23 साल से इस सीट पर काबिज, इस बार माहौल अलग 

Dainik Bhaskar

Apr 26, 2019, 02:23 AM IST

जबलपुर. कांग्रेस प्रत्याशी विवेक तन्खा और उनके सामने हैं भाजपा के कद्दावर नेता और प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह। महाकौशल की राजनीति का केंद्र जबलपुर सीट को जीतना कांग्रेस के लिए चुनौती बन गया है। ये सीट भाजपा का गढ़ है, यहां पर 1996 से भाजपा लगातार जीत का परचम लहराती रही है। 23 साल से भाजपा को यहां पर कोई नहीं डिगा पाया है। 

 

जबलपुर में भाजपा के राकेश सिंह 2004 से लगातार सांसद हैं, वह इस सीट पर चौका जड़ने की तैयारी कर रहे हैं। उन्हें रोकने के लिए कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट में वकील और राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा को एक बार फिर से मैदान में उतारा है। हालांकि तन्खा को राकेश सिंह ने 2014 लोकसभा चुनाव में 2 लाख से ज्यादा मतों से हराया था। 

 

23 साल से कोई बदलाव नहीं       
जबलपुर लोकसभ क्षेत्र में जहां पहले बदलाव की प्रवृत्ति रही है। वहीं 1996 के बाद से इस प्रवृत्ति में ही बदलाव आया। पिछले 23 साल से यहां के मतदाता निरंतर भाजपा को जीत का सेहरा पहनाते आ रहे हैं। आजादी के बाद 1951 से लेकर 1974 तक इस सीट पर कांग्रेस परचम लहराती रही। इसके बाद यहां के मतदाता निरंतर बदलाव करते रहे। लेकिन 1996 से जबलपुर के मतदाताओं ने बदलाव पसंद नहीं किया। 

 

जनता पार्टी लहर में शरद यादव बने थे सांसद 
1977 जबलपुर सीट पर बदलाव का साल रहा। यहां से छात्र राजनीति में सक्रिय रहे शरद यादव इस साल मुख्य धारा की राजनीति में कूदे थे, वे जयप्रकाश नारायण के विद्यार्थी आंदोलन से जुड़े थे। उस दौर में कांग्रेस के खिलाफ एक लहर भी बन गई थी। सेठ गोविंद दास उद्योगपति थे, जबकि शरद यादव आम जनता के बीच का चेहरा था। भारतीय लोक दल के टिकट पर चुनाव लड़े शरद यादव ने कांग्रेस के जगदीश नारायण अवस्थी को हरा दिया। 

 

भाजपा के लिए अहम होगा सीट बचाए रखना 
भाजपा के लिए यह सीट कहीं ज्यादा अहम है, क्योंकि यहां से उसके प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह चुनाव लड़ रहे हैं। यहां भाजपा के लिए अपने 23 साल पुराने गढ़ को बचाए रखने की चुनौती है। वहीं कांग्रेस के लिए अपने पुराने गढ़ को फिर से हासिल करने की चुनौती है। जबलपुर में भाजपा की जड़ें गहरी हैं। महाकौशल क्षेत्र का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्यालय भी जबलपुर में है। पिछले छह चुनावों में भाजपा ने यहां जीत हासिल की है, इस सीट पर कांग्रेस अंतिम बार सन 1991 में जीती थी। 

 

पहले लोकसभा में जबलपुर में दो सीटें  
पहले लोकसभा चुनाव में जबलपुर में दो सीटें थीं। सन 1951 में हुए चुनाव में जबलपुर उत्तर सीट से कांग्रेस के सुशील कुमार पटेरिया जीते थे और मंडला-जबलपुर दक्षिण सीट से पहले मंगरु गुरु उइके सांसद बने। सन 1957 में जबलपुर और मंडला दो अलग-अलग संसदीय क्षेत्र बन गए। इस साल दूसरी लोकसभा के लिए हुए चुनाव में कांग्रेस के सेठ गोविंद दास जीते। इसके बाद उनकी जीत का सिलसिला चलता रहा। उन्होंने 1962, 1967 और 1971 के चुनाव भी जीते। 

 

नर्मदा तट पर बसी संस्कारधानी 
पवित्र नर्मदा नदी के तट पर स्थित जबलपुर को मध्य प्रदेश की संस्कारधानी भी कहा जाता है। यहां भारतीय आयुध निर्माणियों के कारखाने तथा पश्चिम-मध्य रेलवे का मुख्यालय भी है। पुराणों और किंवदंतियों के अनुसार इस शहर का नाम पहले जबालिपुरम् था, क्योंकि इसका संबंध महर्षि जाबालि से जोड़ा जाता है। जिनके बारे में कहा जाता है कि वह यहीं निवास करते थे। 

 

आठ विधानसभा सीटें : जबलपुर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत विधानसभा की आठ सीटें हैं- पाटन, जबलपुर उत्तर, पनागर, बरगी, जबलपुर कैंट, सिहोरा, जबलपुर पूर्व और जबलपुर पश्चिम। इनमें से चार पर कांग्रेस और चार पर भाजपा का कब्जा है।

 

अब तक लोकसभा चुनावों में हारे और जीते प्रत्याशी  

 

क्रमांक  जीते  हारे 
1957 सेठ गोविंददास (कांग्रेस)   महेशदत्ता (पीएसपी)
1962 सेठ गोविंददास (कांग्रेस) जगन्नाथ प्रसाद द्विवेदी (जेएस)
1967 सेठ गोविंददास (कांग्रेस) बाबूराव परांजपे (बीजेएस)
1971 सेठ गोविंददास (कांग्रेस) बाबूराव परांजपे (बीजेएस)    
1977 शरद यादव (बीजेडी) जगदीश नारायण अवस्थी (कांग्रेस)
1980 मुंदर शर्मा (कांग्रेस)   राजमोहन गांधी (जेएनपी)
1984 अजय नारायण मिश्रा (कांग्रेस)  बाबूराव परांजपे (भाजपा)
1989 बाबूराव परांजपे (भाजपा) अजय नारायण मिश्रा (कांग्रेस)
1991 श्रवण कुमार पटेल (कांग्रेस)  बाबूराव परांजपे (भाजपा) 
1996 बाबूराव परांजपे (भाजपा)   श्रवण कुमार पटेल (कांग्रेस)
1998 बाबूराव परांजपे (भाजपा) डॉ. आलोक चंसोरिया (कांग्रेस)
1999 जयश्री बनर्जी (भाजपा) चंद्रमोहन (कांग्रेस)
2004 राकेश सिंह (भाजपा)   विश्वनाथ दुबे (कांग्रेस)
2009 राकेश सिंह (भाजपा)  रामेश्वर नीखरा (कांग्रेस)
2014 राकेश सिंह (भाजपा)   विवेक तन्खा (कांग्रेस)

 

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