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अफसर फील्ड नहीं संभाल रहे, हम रोड पर कचरा फेंकने की आदत नहीं बदल रहे, इसलिए सफाई में पिछड़े

स्वच्छता सर्वेक्षण अवॉर्ड अनाउंसमेंट के साथ ही स्वच्छता एप आधारित स्वच्छ सिटी रैंकिंग जारी हुई है। स्वच्छता...

Bhaskar News Network | Last Modified - May 18, 2018, 04:50 AM IST

अफसर फील्ड नहीं संभाल रहे, हम रोड पर कचरा फेंकने की आदत नहीं बदल रहे, इसलिए सफाई में पिछड़े
स्वच्छता सर्वेक्षण अवॉर्ड अनाउंसमेंट के साथ ही स्वच्छता एप आधारित स्वच्छ सिटी रैंकिंग जारी हुई है। स्वच्छता सर्वेक्षण 2018 की असल रैंकिंग आना बाकी है लेकिन स्वच्छता एप के उपयोग और इस पर दर्ज शिकायतों के निराकरण के आधार पर जारी रैंकिंग में जावरा देशभर में 710वें, प्रदेश में 73वें, उज्जैन संभाग में 10वें और जिले में दूसरे नंबर पर रहा है।

देश-प्रदेश के अन्य शहरों की तुलना में भले हमारी रैंकिंग थोड़ी ठीक है लेकिन अव्वल आने या स्वच्छता अवॉर्ड पाने का सपना पूरा नहीं हुआ। सरकारी आंकड़ों में शहर की रैंकिंग तो असल रिजल्ट जारी होने पर सामने आएगी लेकिन धरातल पर नंबर वन आने के लिए जैसी सफाई व्यवस्था और लोगों का सहयोग चाहिए, वैसा नहीं है। देश में नंबर वन रहे इंदौर के लोग कार तक में डस्टबिन रखते हैं और यहां दुकानदार भी रोड पर ही कचरा फेंक रहे हैं। अफसर कुर्सी छोड़कर फील्ड नहीं देख रहे। नागरिक जिम्मेदारी का पालन नहीं कर रहे। सालों से कचरा जहां-तहां फेंकने की आदत नहीं बदल रहे। इसलिए अवॉर्ड से तो चूक गए। अब नंबर 1 आने पर संशय है। हालांकि अधिकारी सुधार के दावे कर रहे हैं।

नगर की 80 हजार आबादी के बीच से रोज करीब 10 टन कचरा निकल रहा है। सफाई व्यवस्था में नगरपालिका के 334 कर्मचारी लगे हैं। 6 कचरा संग्रहण वाहन घर-घर जा रहे। एक वाहन पूजन सामग्री के लिए शहर में भ्रमण करता है। हर महीने वेतन व सफाई संबंधी अन्य व्यवस्था पर करीब 50 लाख रुपए खर्च हो रहे हैं। फिर भी स्वच्छता के मामले में नगर काफी पिछड़ा हुआ है। रोज सुबह सफाई होती है लेकिन दोपहर तक नगर की सड़कें कचरे से पट जाती हैं। गली-मोहल्लों में हर तरफ कचरा नजर आने लगता है। यही कारण है कि स्वच्छता रैंकिंग में हम पिछड़ गए।

स्वच्छता रैंकिंग में पिछड़ने के ये हैं प्रमुख कारण

खाचरौद नाका पर इस तरह फैल रहती है गंदगी।

अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के दावे, अब समीक्षा के बाद कमियां दूर करेंगे

नपा स्वास्थ्य अधिकारी अशोक शर्मा ने बताया मॉनिटरिंग सिस्टम मजबूत करेंगे। हम समय-समय पर फील्ड में जाते हैं लेकिन अब इसे नियमित शेड्यूल बनाएंगे। पर्याप्त साधन-संसाधन नहीं हैं, इन्हें बढ़ाएंगे। नपाध्यक्ष अनिल दसेड़ा का कहना है पहली बार में अंडर 100 का लक्ष्य था जो प्राप्त किया है। हालांकि नंबर वन नहीं आए इसकी कसक है। समीक्षा करेंगे कि कहां पिछड़े हैं। बिना जनसहयोग के सफलता संभव नहीं है। इसलिए जनजागरण लाएंगे। ओडीएफ व अन्य कारणों से पिछड़े हैं लेकिन अब जो कमियां हैं, उन्हें दूर करेंगे। पूरी मॉनिटरिंग करेंगे। जुर्माने की कार्रवाई से किसी को किसी ने नहीं रोका। अफसरों से कहेंगे वे कार्रवाई करें। इस बार सर्वे में अच्छी स्थिति पर पहुंचने का प्रयास रहेगा। जरूरी साधन-संसाधन भी जुटाएंगे।

नपा का मॉनिटरिंग सिस्टम सही से काम नहीं कर रहा है। जो सफाई व्यवस्था एक बार लागू की जाती है, वह नियमित वैसी नहीं चलती।

सार्वजनिक स्थानों पर पर्याप्त डस्टबिन नहीं हैं। जहां लगाए थे, वे लोग तोड़ गए।

डस्टबिन का सही उपयोग नहीं हुआ। चंद लोगों को खुश रखने के लिए निजी उपयोग के लिए बांट दिए। लोहे के स्थायी डस्टबिन नहीं लगाए।

सर्वेक्षण के दौरान शहर ओडीएफ नहीं था। इसलिए भी रैंकिंग घट गई।

दुकानदारों ने डस्टबिन उपयोग शुरू नहीं किया। रोड पर कचरा फेंक रहे। ज्यादातर लोग भी डस्टबिन तलाशे बगैर कचरा फेंक रहे हैं।

पॉलीथिन प्रतिबंधित है लेकिन इसका पालन नहीं हो रहा।

अफसर दफ्तर छोड़कर फील्ड में नहीं जा रहे। राजनीतिक दबाव में जुर्माने जैसी कार्रवाई नहीं हो रही। इससे लोग गंदगी कर रहे हैं।

नपा अधिकारियों के मुताबिक जनसंख्या के मान से 21 कचरा संग्रहण वाहन चाहिए लेकिन 7 ही हैं। एक जेसीबी व दो डंपर जरूरी है लेकिन नहीं हैं। नपा आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण खरीदी में दिक्कत है।

समाजसेवा के नाम से कई संगठन हैं लेकिन वे भोजन पार्टियों तक सीमित हैं। जनजागरण या स्वच्छता के क्षेत्र में जमीनी काम करने में किसी का सहयोग नहीं। चंद लोग आगे आते हैं लेकिन उन्हें बाकी का सपोर्ट नहीं मिलता।

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