झाबुआ

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30 फीट ऊंचे मचान पर कमर के बल झूले, दहकते अंगारों पर भी चले

झाबुआ से 12 किमी दूर खरड़ूब़ड़ी में गल पर घूमकर मन्नत पूरी की। जिले में गल-चूल का त्योहार पारंपरिक रूप से मनाया ...

Danik Bhaskar

Mar 04, 2018, 02:50 AM IST
झाबुआ से 12 किमी दूर खरड़ूब़ड़ी में गल पर घूमकर मन्नत पूरी की।

जिले में गल-चूल का त्योहार पारंपरिक रूप से मनाया

झाबुआ | सिर पर पीली पगड़ी, शरीर पर लाल कपड़ा और सफेद धोती पहने मन्नतधारी...। करीब 30 फीट ऊंचे गल पर कमर के बल झूलते हुए गल देवता का नारा लगाया इसके साथ ही दहकते अंगारों पर चलकर श्रद्धालुओं ने मन्नत भी उतारी। कार्यक्रम में आसपास के जिलों से भी लोग शाामिल हुए।

धुलेंडी पर्व पर शुक्रवार शाम नगर की सीमा में स्थित ग्राम बिलीडोज में गल पर्व के दौरान यह नजारा देखने को मिला। दो दर्जन से अधिक ग्रामीण यहां अपनी मन्नतपूरी करने पहुंचे। किसी के यहां गल देवता की मन्नत के बाद संतान हुई थी तो कोई बीमारी से चंगा हुआ। चूंकि मान्यता है कि मन्नत विवाहित व्यक्ति ही उतार सकता है, इसलिए बहुत से मन्नतधारियों के परिजन ने इस परंपरा का निर्वहन किया। तड़वी ने मन्नतधारियों को गल पर घूमाया।

कहां मनाते हैं गल- शहर से लगे ग्राम बिलीडोज में हर साल परंपरागत रूप से मनाते हैं गल पर्व। इस दौरान यहां मेले जैसा माहौल हो जाता है। आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में ग्रामीण पहुंचते हैं।

कैसे उतारते हैं मन्नत- मन्नतधारी को कमर के बल रस्सी से बांधा जाता है। फिर मन्नत के अनुसार वह गल देवरा की जय करते हुए हवा में झूलते हुए 5 से 7 परिक्रमा करता है।

टेमरिया में अंगारों पर चलकर बच्चे की मान उतारी।

गड्ढे में भरे अंगारों पर नंगे पैर चले

धुलेंडी पर पेटलावद, करड़ावद, बावड़ी, करवड़, अनंतखेड़ी, टेमरिया आदि स्थानों पर गल-चूल पर्व पारंपरिक रूप से मनाया गया। ग्रामीण मन्नतधारियों ने दहकते अंगारों से भरे गड्ढे के बीच नंगे पैर गुजरते हुए अपनी मन्नत पूरी की। साथ ही अपने आराध्य भगवान को शीश झुकाया। यह सिलसिला शाम तक जारी रहा। आस्था के इस अनूठे आयोजन को देखने के लिए न केवल स्थानीय बल्कि पड़ोसी रतलाम व धार जिले के ग्रामीण भी बड़ी तादाद में पहुंचे।

क्या है चूल परंपरा : करीब तीन-चार फूट लंबे तथा एक फीट गहरे गड्ढ़े में दहकते हुए अंगारे रखे जाते हैं। माता के प्रकोप से बचने और अपनी मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु माता का स्मरण करते हुए जलती हुई आग में से निकल जाते हैं।

दशकों से निभाई जा रही परंपरा : इस पौराणिक परंपरा को निभाने का क्रम दशकों से चला आ रहा है। चूल वाले स्थान में अंगारों के रूप लगाई जाने वाली लकड़ियां और मन्नतधारी के आगे-आगे डाले जाने वाला घी गांव के अनेक घरों से श्रद्धानुरूप आता है। इस बार करीब 25 किलो घी की आहुति चूल में दी गई।

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