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आजादी से पहले जैविक तरीके से होती थी खेती

Jhabua News - जलवायु परिवर्तन अनुकूलन में जैविक कृषि का प्रभाव अध्ययन रिपोर्ट प्रस्तुतिकरण कार्यशाला का आयोजन स्थानीय निजी...

Dainik Bhaskar

Jul 11, 2018, 02:45 AM IST
आजादी से पहले जैविक तरीके से होती थी खेती
जलवायु परिवर्तन अनुकूलन में जैविक कृषि का प्रभाव अध्ययन रिपोर्ट प्रस्तुतिकरण कार्यशाला का आयोजन स्थानीय निजी होटल के सभा गृह में किया गया। जिसमें झाबुआ एवं राणापुर विकासखंड के करीब 50 कृषक सम्मिलित हुए। उन्होंने अपने अनुभव भी साझा किए।

मध्यांचल फोरम इंदौर के जिला समन्वयक बेनेडिक्ट डामोर ने कहा आर्गेनिक फार्मिंग जैविक खेती का नाम वैज्ञानिकों ने दिया हैै, क्योंकि वह वर्तमान में हो रही खेती को पारंपरिक खेती मानते हैं। वैसे अगर भारत की बात करें, तो देश में आजादी से पहले पारंपरिक खेती जैविक तरीके से ही की जाती थी, जिसमें किसी भी प्रकार के रसायन के बिना फसलें पैदा की जाती थी, लेकिन आजादी के बाद भारत को फसलों के मामले में आत्मनिर्भर बनाने के लिए हरित क्रांति की शुरुआत हुई। जिससे रसायनों एवं कीटनाशकों की मदद से उन फसलों का भी भरपूर मात्रा में उत्पादन किया जाने लगा, जिसके बारे में कभी सोचा भी नहीं जा सकता था। कार्यक्रम में कृषि विभाग झाबुआ के सहायक संचालक एसएस चौहान ने किसानों को जैविक कृषि को बढ़ावा देने के लिए संबोधित किया। साथ ही बताया वर्तमान में रासायनिक खेती के बढ़ते प्रभाव को देखकर वैज्ञानिकों से इसे घातक सिद्ध कर दिया है। ना केवल मृदा बल्कि इंसानों की सेहत पर भी इसका प्रभाव पड़ रहा है। इसी प्रकार बढ़ते प्रभाव को देखते हुए वैज्ञानिकों ने जैविक खेती को मृदा की उर्वरा और इंसानों की सेहत के लिए अच्छा बताया है। कार्यशाला में अध्ययन रिपोर्ट अजहर उल्ला खान ने प्रस्तुत की।

हरित क्रांति के कारण खेती में विकास हुआ -जिला समन्वयक डामोर ने बताया हरित क्रांति के कारण गेहूं, ज्वार, बाजरा और मक्का की खेती में काफी विकास हुआ। इस दौरान जहां प्रति हेक्टेयर 2 किलोग्राम रासायनिक उर्वरक का प्रयोग किया जाता था, वहीं आज प्रति हेक्टेयर बढ़कर 100 किलोग्राम से भी ज्यादा हो चुका है। हरित क्रांति के कारण जिस जैविक खेती को भारत बरसों से आजमा रहा था, वो खत्म हो चुकी थी।

‘जलवायु परिवर्तन अनुकूलन में जैविक कृषि का प्रभाव’ विषय पर डामोर ने किया संबोधित

निजी होटल के सभागार में आयोजित कार्यशाला में आसपास के क्षेत्रों के किसान शामिल हुए।

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