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हम दैनिक क्रियाओं में ज्ञान का उपयोग नहीं करते हैं तो वह सिर्फ जानकारी कहलाता है

मनुष्य अपनी क्रियाओं में शुद्ध दान, शुद्ध तप, शुद्ध शील व शुद्ध भाव लाए तो ही भाव श्रावक बनेंगे और शुद्ध क्रिया पालक...

Bhaskar News Network| Last Modified - Aug 02, 2018, 03:05 AM IST

हम दैनिक क्रियाओं में ज्ञान का उपयोग नहीं करते हैं तो वह सिर्फ जानकारी कहलाता है
हम दैनिक क्रियाओं में ज्ञान का उपयोग नहीं करते हैं तो वह सिर्फ जानकारी कहलाता है
मनुष्य अपनी क्रियाओं में शुद्ध दान, शुद्ध तप, शुद्ध शील व शुद्ध भाव लाए तो ही भाव श्रावक बनेंगे और शुद्ध क्रिया पालक होंगे। अपने ज्ञान का दैनिक क्रियाओं में उसका उपयोग नहीं करते हैं तो ज्ञान केवल मात्र जानकारी कहलाता है। उपयोग सहित ज्ञान से ही मोक्ष संभव है।

यह बात साध्वीश्री पुनीतप्रज्ञाश्रीजी ने बुधवार को स्थानीय बावन जिनालय कही। उन्होंने 10 प्रकार के पच्चखान पर भी विस्तृत प्रकाश डालते हुए कहा अगर आप की अनुकूलता नहीं है तो कम से कम संकेत पच्चखान तो करना ही चाहिए। जिससे आप पशुवत व्यवहार से बच सकते है। साध्वीश्री ने पालीताना तीर्थ के कवड यक्ष का उदाहरण देते हुए समझाया कि पच्चखान में आयुष्य बंध होने से देवलोक मिलता है व 27 उपवास का लाभ मिलता है। उन्होंने 4 प्रकार के भोजन के बारे में भी बताया। शांत सुधारस ग्रंथ के उद्धरण में आज उन्होंने 4 संज्ञाओं को समझाया। साध्वीश्री ने कहा आहार, भय, मैथुन व परिग्रह इन चारों संज्ञाओं को नियंत्रित करने से ही सामयिक में समभाव आता है। हमें मन से धर्म करने में चढ़ते विचार रखने चाहिए न कि धन कमाने में। धन उतना ही कमाए - जितने की जरूरत है।

दोपहर में चल रहे शिविर में साध्वीश्री प्रशमजी ने महिलाओं को कर्म के बारे में समझाया। उन्होंने कहा आत्मा तुम्बी की तरह हल्की है, लेकिन उस पर इतना कर्म मल मिट्टी की तरह चिपका हुआ है। वह संसार सागर में डूबी हुई है। निरंतर सुविचार व सुकार्य से यह कर्म मेल गलेगा व आत्मा ऊर्ध्वगमन कर मोक्ष प्राप्त करेगी। उन्होंने बताया कुविचार मन में रखने से कुसंस्कार बनते हैं। इसलिए आने वाले भव की चिंता कर धर्मी बने।



प्रवचन सुनने बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविका बावन जिनालय पहुंचे।

आज हम धन के कारण धर्म से मुंह मोड़ रहे हैं, ज्यादा धन से अशांति मिलेगी : साध्वीश्री

मेघनगर |
व्यक्ति धन के पीछे भाग रहा है, धन को ही सब कुछ मान चुका है। धन से मात्र भौैतिक सुख सुविधा प्राप्त होगी। आज हम धन के कारण धर्म से मुंह मोड़ रहे हैं। ज्यादा धन से अशांति मिलेगी। उक्त प्रेरणादायी बात साध्वीश्री अनेकांतलताश्रीजी ने श्री राजेंद्रसूरी ज्ञान मंदिर हॉल में धर्मसभा में श्रावक-श्राविकाओं से कही। उन्होंने डाकू उगलीमाल का उदाहरण देते हुए बताया धर्म ने ही डाकू को पाप के रास्ते से बचाया। बाद में वे लेखक बने। दुनिया स्वार्थ से भरी है। दुनिया में कोई किसी का नहीं है। अपनी आत्मा के लिए धर्म आराधना जरूरी है। जीवन में विनय जरूरी है। क्रोध को छोड़कर क्षमा को अपनाएं। क्रोध अंधा होता है। क्षणभर के क्रोध से घर तबाह हो जाता है। क्रोधी व्यक्ति नरक गति में जाता है। संदीप जैन ने बताया 2 अगस्त से सिद्धितप की तपस्या शुरू हो रहीह ै। प्रभावना विजेंद्र कुमार तनिष्क सेठिया परिवार ने दी।

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