झाबुआ

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‘तपती गर्मी’ तमिल भाषा में भी प्रकाशित होगी

झाबुआ के डॉ. चंचल की कविता फिलहाल सीबीएसई के दसवीं के पाठ्यक्रम में पढ़ाई जा रही है राष्ट्रीय स्तर पर...

Dainik Bhaskar

May 01, 2018, 03:15 AM IST
‘तपती गर्मी’ तमिल भाषा में भी प्रकाशित होगी
झाबुआ के डॉ. चंचल की कविता फिलहाल सीबीएसई के दसवीं के पाठ्यक्रम में पढ़ाई जा रही है

राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत हो चुकी है यह रचना

भास्कर संवाददाता | झाबुआ

नगर के डॉ. रामशंकर चंचल की प्रसिद्ध कविता ‘तपती गर्मी’ अब तमिल में भी प्रकाशित होगी। हाल ही में इस कविता का तमिल में अनुवाद तमिल साहित्यकार संत आनंद कृष्णन रमन ने किया है। यह कविता फिलहाल सीबीएसई के दसवीं के पाठ्यक्रम में पढ़ाई जा रही है। यह कविता राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत भी की गई है।

डॉ. चंचल की सामयिक कविता ‘तपती गर्मी’ सेंट्रल बोर्ड ऑफ एजुकेशन द्वारा निर्धारित हिंदी पाठ्यक्रम की पुस्तक (श्रेष्ठ हिंदी व्याकरण तथा रचना) में कक्षा 10वीं के लिए चयनित की गई है। इस कविता को राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित प्रतियोगिता में राष्ट्रीय पत्रिका आरावली उद्घोष द्वारा पुरस्कृत किया गया है। ‘तपती गर्मी’ को हाल में ही तमिल प्रख्यात साहित्यकार और संत आनंद कृष्णन सेतु रमन द्वारा तमिल में अनुवाद किया गया है। डॉ. चंचल की इस कविता को राष्ट्रीय स्तर पर प्रचारित होने पर शहर के साहित्यकारों में हर्ष है। यह हर्ष का विषय है की डॉ. चंचल की उक्त रचना ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ करवाकर झाबुआ का गौरव बढ़ाया है। स्थानीय साहित्यिक संस्थाओं और गणमान्य नागरिकों ने इस उपलब्धि पर डॉ. चंचल को बधाई दी है।

आदिवासी अंचल की गर्मी को दर्शाया

हलवाई की भट्‌टी सा/ तपता दिन

मातम मनाते खामोश पेड़

यहां से वहां तक पूरा जंगल उदास अनमना,

इस कविता में आदिवासी अंचल की गर्मी की भीषणता को दर्शाया गया है। गर्मी के दिनों में जब आदिवासी मजदूरी के लिए जाते हैं और शाम को घर आते हैं तो उनके बच्चे गर्मी से बेहाल नजर आते हैं। उनमें ताकत नहीं होती है कि वे उठकर अपने माता-पिता से लिपट जाएं। बच्चों की यह हालत देख माता-पिता दु:खी होते हैं। कविता में इस दृश्य का मार्मिक चित्रण करते हुए आदिवासी क्षेत्र के श्रमिकों के हालात दर्शाए गए हैंं। इससे आदिवासियों के वास्तविक जीवन का अहसास होने लगता है।

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