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रक्षाबंधन पर नहीं रहेगी भद्रा की छाया, दिनभर मुहूर्त

Jhabua News - रक्षाबंधन पर्व पर इस बार भद्रा का साया नहीं रहेगा। सूर्योदय से पूर्व ही भद्रा समाप्त हो जाने से बहनें दिन में...

Dainik Bhaskar

Aug 11, 2018, 03:26 AM IST
रक्षाबंधन पर नहीं रहेगी भद्रा की छाया, दिनभर मुहूर्त
रक्षाबंधन पर्व पर इस बार भद्रा का साया नहीं रहेगा। सूर्योदय से पूर्व ही भद्रा समाप्त हो जाने से बहनें दिन में भाइयों को कभी भी राखी बांध सकेंगी। सूर्योदय व्यापिनी तिथि मानने के कारण रात में भी राखी बांधी जा सकेगी। ज्योतिषियों के अनुसार चार साल बाद ऐसा संयोग बना रहा है कि इस बार रक्षाबंधन पर्व पर भद्रा का साया नहीं रहेगा।

पंचांग के मुताबिक पूर्णिमा 25 अगस्त दोपहर 3.15 बजे से 26 अगस्त को शाम 5.30 बजे तक रहेगी। खास बात यह है कि इस दिन धनिष्ठा नक्षत्र भी है। यह नक्षत्र दोपहर 12.35 बजे तक रहेगा। वहीं 26 अगस्त को पूर्णिमा शाम 5.26 तक होने से यह त्योहार पूरे दिन मनाया जाएगा। पंडित हिमांशु शुक्ल ने बताया कि इस बार श्रावण पूर्णिमा ग्रहण से मुक्त रहने के चलते रक्षाबंधन का त्योहार सौभाग्यशाली रहेगा। वहीं रक्षाबंधन के दिन धनिष्ठा नक्षत्र होने के कारण पंचक रहेगा। राखी बांधने में यह बाधक नहीं रहेगा। बहनें पूरे दिन में कभी भी राखी बांध सकती हैं।

त्योहार

रक्षाबंधन के दिन धनिष्ठा नक्षत्र होने के कारण पंचक रहेगा, राखी बांधने में यह बाधक नहीं रहेगा

इस साल सूर्याेदय से पहले समाप्त होगी भद्रा

पंडित शुक्ल का कहना है कि रक्षाबंधन का एक आवश्यक नियम है कि भद्रा काल में राखी नहीं बांधी जाती है। इस वर्ष एक अच्छी बात यह है कि भद्रा सूर्योदय से पूर्व ही समाप्त हो जाएगी। इस प्रकार भाई बहन के इस पवित्र महापर्व को प्रेम और श्रद्धा पूर्वक मनाने से भाई बहन का संबंध आजीवन बना रहता है।

यह है श्रेष्ठ मुहूर्त



बाजार में बढ़ने लगी रौनक

रक्षाबंधन पर्व जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे बाजार में भी चहल-पहल बढ़ गई है। कपड़ा दुकानों और सौंदर्य प्रसाधनों की दुकानों पर ग्राहकी ज्यादा है। यह आने वाले दिनों में और बढ़ेगी।

क्या है पंचक

धनिष्ठा से रेवती तक पांच नक्षत्रों को पंचक कहा जाता है, जो कि पांच दिनों तक चलता है। पंचक को लेकर भ्रांति लोगों में यह है कि इसमें कोई कार्य नहीं करना चाहिए। बल्कि पंचक में अशुभ कार्य नहीं करना चाहिए। इसमें शुभ कार्य कर सकते हैं, क्योंकि उनकी पांच बार पुनरावृत्ति होती है। पूर्व में सिंह के सूर्य में आने से इसकी महत्ता और बढ़ गई है।

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