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आंजनेय व जंगल में दर्पण पुस्तकों की समीक्षा हुई

साहित्य अकादमी मप्र संस्कृति परिषद भोपाल से संचालित पाठक मंच योजना के तहत एक साथ दो पुस्तकों की समीक्षा की गई।...

Dainik Bhaskar

Aug 08, 2018, 03:45 AM IST
आंजनेय व जंगल में दर्पण पुस्तकों की समीक्षा हुई
साहित्य अकादमी मप्र संस्कृति परिषद भोपाल से संचालित पाठक मंच योजना के तहत एक साथ दो पुस्तकों की समीक्षा की गई। कार्यक्रम दो सत्र में आयोजित किया गया। प्रथम सत्र में रचनाकार रामप्रकाश तिवारी की पुस्तक ‘आंजनेय’ एवं द्वितीय सत्र में लेखक तरुण भटनागर की ‘जंगल में दर्पण’ पुस्तक की समीक्षा साहित्यकारों ने की।

कार्यक्रम की शुरुआत साहित्यकार डॉ. रामशंकर ‘चंचल’, अरविंद व्यास पीडी रायपुरिया, प्रवीण सोनी ने मां सरस्वती की प्रतिमा पर दीप प्रज्ज्वलित कर की। कार्यक्रम के आयोजक व पाठक मंच इकाई के जिला संयोजक भेरूसिंह चौहान ‘तरंग’ ने स्वरचित सरस्वती वंदना ‘ज्ञान का दीप जला दो’ प्रस्तुत की। डॉ. ‘चंचल’ ने प्रस्तुत कृति सरल सहज काव्यात्मक रूप में उनके चरित्र का वर्णन किया। श्रीराम और आंजनेय (हनुमान) का चरित्र संसार के लिए काफी प्रेरणादायक है। ‘तरंग’ ने बताया रूद्रावतार आंजनेय ने वानर जाति में जन्म लिया था। उनका चरित्र अदभुत तथा लोकोत्तर है। आंजनेय अदभुत और रोमांचकारी ग्रंथ है। ‘जंगल में दर्पण’ की समीक्षा करते हुए अरविंद व्यास ने कहा भाषा सहज-सुबोध और प्रवाहमय है। कहानियां सटीक और प्रवाहशील है जो हमारे आसपास के जीवन पर केंद्रित है। वैसे तो सभी कहानियां पठनीय है फिर भी ‘रोना’, गुम और टेबल कथा पाठकों को सदैव स्मरण रहेगी। पीडी रायपुरिया न कहा ‘जंगल में दर्पण’ कहानी संग्रह समकालीन कथा साहित्य का उत्कृष्ट उदाहरण है। पुस्तक में जनजाति जीवन, जंगल पूंजीवादी वर्ग का लेखा-जोखा और मिथकों को जादुई संसार को अपने कलेवर में समेट लेने वाली श्रेष्ठ कृति है। प्रवीण सोनी ने कहा ‘जंगल में दर्पण’ कहानी संग्रह की प्रमुख विशेषता पात्रों के अनुकूल भाषा शैली सजीव-जीवंत परिदृष्य और भाषा की मधुरता एवं विषयों की नवीनता ने संग्रह को मूल्यवान बना दिया। अन्य उपस्थित साहित्यकारों एवं पाठकोँ ने भी दोनों ही पुस्तकों के संदर्भ में अपने विचार व्यक्त किए। अंत में ‘काव्य-गोष्ठी’ का भी आयोजन किया।

पाठक मंच ने रखा कार्यक्रम, गोष्ठी का आयोजन भी हुआ, दो सत्रों में चला कार्यक्रम

पुस्तक के संबंध में साहित्यकारों ने अपने विचार रखें।

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