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भूलवश नियम भंग हो तो साधु और श्रावक को होती है छूट : पुनीताश्रीजी

बावन जिनालय में शनिवार को धर्मसभा के दौरान साध्वी पुनीतप्रज्ञाश्रीजी ने नियमों के बारे में जानकारी दी। कहा कि...

Bhaskar News Network | Last Modified - Aug 05, 2018, 03:50 AM IST

भूलवश नियम भंग हो तो साधु और श्रावक को होती है छूट : पुनीताश्रीजी
बावन जिनालय में शनिवार को धर्मसभा के दौरान साध्वी पुनीतप्रज्ञाश्रीजी ने नियमों के बारे में जानकारी दी। कहा कि जिन शास्त्रों के नुसार पच्छखाणों में कुछ विशेष कारणों से छूट भी दी गई है, जिसे आगार कहते हैं। भूल वश अज्ञानता की वजह से यदि श्रावक से कोई नियम भंग होता है तो उसे छूट मिलती है अर्थात नियम भंग नहीं होता। पुनीत प्रज्ञाश्रीजी के अनुसार हर श्रावक श्राविका को पच्छखाण तो रखना ही चाहिए, जिससे आयुष्य बंध होने पर शुभ कर्म बंधते है। शांतसुधारस के प्रवचनों को आगे बढ़ाते हुए प्रमोदयशा श्रीजी ने बताया कि जिस तरह साइकल को स्टैंड से उतारे बिना आगे चला नहीं सकते, उसी प्रकार हम अपनी क्रियाओं की साइकल राग द्वेष रूपी स्टैंड से उतारेंगे नहीं तब तक मोक्ष मार्ग पर चलेंगे कैसे। इसलिए चाहे जितनी तपस्या,क्रियाएं करो लेकिन राग द्वेष यदि मन में है तो सब कुछ निरर्थक है। आत्मा का शत्रु हम स्वयं है क्योंकि हम राग द्वेष मन से मिटा नहीं रहे, जब मन निर्मलता से चिंतन करता है,स्वाध्याय करता है,कुविचारों का त्याग व सद्गुण विकसित करता है तब ही उसकी क्रियाएं व तप सार्थक है। कोई भी बाधा या नियम लेकर उसका अन्तःकरण से आनंद लेना,दूसरों को अकर्म करते देख उन पर करुणा रखना, तब ही धर्म क्रिया में रस आता है। देवकी रानी के उदाहरण से बताया कि जिनका आयुष्य प्रबल होता है उसे कोई नहीं मार सकता जिससे देवकी के 6 पुत्र देव के द्वारा बचा लिए गए और वे सब मुनि बने।

पुरुषों की तत्वज्ञान कक्षा -झाबुआ में पहली बार पुरुषों की तत्व ज्ञान कक्षा साध्वीश्रीजी द्वारा सुबह 6.30 बजे ली जा रही है। इसमें ओएल जैन, अंतिम जैन, सुनील संघवी, राजेश मेहता, रचित कटारिया, शाश्वत मेहता आदि कई श्रावक हिस्सा ले रहे हैं। रविवार के शर्कसत्व का लाभ यशवंत भंडारी परिवार ने लिया है।

झाबुआ. बावन जिनालय में आचार्य जयंतसेनजी का पूजन भी किया गया।

जैसे सूर्य के बिना अंधेरा रहता है, वैसे जीवन गुरु के बिना अंधकारमय

मेघनगर | जिस प्रकार सूर्य के बिना अंधेरा रहता है। वैसे ही गुरु के बिना जीवन अंधकारमय है। गुरु का सान्निध्य जिसको मिल जाए उसका बेड़ा पार है। यह बातें राजेंद्रसूरी ज्ञान मंदिर हाल में साध्वी अनेकांतलताश्रीजी ने आचार्य जयंतसेनसूरीजी की 16वीं मासिक तिथि पर गुरु महिमा प्रसंग व्यक्त करते हुए कहीं। उन्होंने बताया गुरुदेव 11 वर्ष की आयु में आचार्य यतींद्रसूरीजी के प्रवचन से प्रभावित हुए और अपना जीवन गुरु को समर्पित कर दिया। अंतिम समय तक संघ समाज की सेवा करते रहे। गुरुदेव करूणा, आनंद, संयम, वैराग्य व ज्ञान की मूर्ति थे। समाज को नई दिशा दी। गुरु के गुणों का गुणगान करना शक्ति सामर्थ्य के बाहर है। साध्वी भगवंतों ने गुरुदेव पर रचित गीत प्रस्तुत किया। प्रभावना का लाभ जयंतीलाल भंडारी परिवार ने लिया। संचालन संदीप जैन ने किया। इस अवसर पर कई श्रावक, श्राविकाओं ने आयंबिल, एकासना, उपवास के प्रत्याख्यान लिए। त्रिस्तुतिक संघ अध्यक्ष शांतिलाल लोढ़ा ने बताया रविवार को विशेष प्रवचन होंगे, जिसमें माता पिता के उपकार किस प्रकार चुकाना है और संतानों के क्या कर्तव्य हैं, यह बताएंगे।

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