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18 खरब लीटर ‘जल’ बढ़ा, 12 हजार हेक्टेयर ‘जमीन’ हुई उपजाऊ पर कट गए 33 वर्ग किमी के ‘जंगल’

विश्व आदिवासी दिवस 9 अगस्त को है। यूएनओ ने 1994 में जल, जमीन और जंगल बचाने के लिए आदिवासियों को जागरूक करने के उद्देश्य...

Dainik Bhaskar

Aug 09, 2018, 03:50 AM IST
विश्व आदिवासी दिवस 9 अगस्त को है। यूएनओ ने 1994 में जल, जमीन और जंगल बचाने के लिए आदिवासियों को जागरूक करने के उद्देश्य से इस दिन को विश्व आदिवासी दिवस घोषित किया था। जल, जमीन और जंगल यानी प्रकृति को बचाने के लिए आदिवासियों से तो उम्मीद की जा रही हैं लेकिन सवाल यह उठता है कि सरकारें आदिवासियों को जल, जमीन और जंगल देने के लिए कितना प्रयास कर रही हैंं। भास्कर ने जल संसाधन, कृषि व वन विभाग के 5-6 सालों के आंकड़े जुटाए तो सामने आया कि जल की उपलब्धता बढ़ने से जमीनें उपजाऊ हुई और रबी की फसल का रकबा बढ़ गया लेकिन जंगल लगातार कट रहे हैं। आइए विस्तार से जानते हैं जल, जमीन व जंगल को लेकर क्या-क्या प्रयास हुए।

5 साल में जल संरचनाएं बढ़ने की वजह से 13 से बढ़कर 31 खरब लीटर हो गया पानी

2012-13 तक जिले में 192 जल संरचनाएं थीं। इनकी क्षमता करीब 13 खरब लीटर थी। 2017-18 में जिले में 227 जल संरचनाएं हो चुकी हैं। इनकी कुल क्षमता 31 खरब लीटर पानी सहेजने की है। यानी पांच साल में उपलब्ध पानी 18 खरब लीटर बढ़ गया। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा माही परियोजना का है। करीब साढ़े 13 खरब लीटर पानी एकमात्र माही परियोजना से जिले को मिल रहा है। माही ही नहीं छोटी-बड़ी अन्य परियोजनाएं भी इस दौरान बनीं। कुल 35 जल संरचनाएं पांच साल में बढ़ गई हैं। इन जल संरचनाओं के बढ़ने से झाबुआ जिले में पानी भी काफी मात्रा में तेजी से बढ़ा। लोगों में जागरुकता के चलते भी पानी की मात्रा में इजाफा हुआ।


पानी बढ़ने के बावजूद हमारे जिले में 1 लाख हेक्टेयर जमीन में होती है एक ही फसल

पांच साल में जिले की जमीनें भी उपजाऊ हो गई हैं। बरसात यानी खरीफ की फसल तो जिले में करीब 1.88 लाख हेक्टेयर में होती हैं। बरसों से लगभग इतने क्षेत्र में जिले में खरीफ फसल होती है लेकिन ठंड की यानी रबी की फसल पानी की कमी के कारण एक तिहाई क्षेत्र में भी नहीं हो पाती है। 2013 में अच्छी बारिश होने पर भी 73253 हेक्टेयर जमीन पर रबी की फसल हुई थी। जबकि पिछली रबी की फसल 85704 हेक्टेयर जमीन पर ली गई। यानी 12 हजार हेक्टेयर उपजाऊ जमीन बढ़ी है। हालांकि अब भी 1 लाख हेक्टेयर जमीन ऐसी है, जहां केवल एक फसल ली जाती है।


झाबुआ जिले में 6 साल में आधा प्रतिशत हिस्सा जंगल से समतल जमीन में बदला

जिले में जंगल कटता चला जा रहा है। यह भारतीय वन सर्वेक्षण के 2017 के सर्वे से भी स्पष्ट हो गया है। 2011 में हुए सर्वे के दौरान अविभाजित झाबुआ जिले में 937 वर्ग किमी के इलाके में जंगल था। 2017 में जब सर्वे हुआ तो झाबुआ और आलीराजपुर जिलों का अलग सर्वे हुआ। आलीराजपुर में 675 और झाबुआ में 229 वर्ग किमी में जंगल पाया गया। यानी छह साल में करीब 33 वर्ग किमी का जंगल कट गया। 2011 में कुल क्षेत्रफल के 13.8 प्रतिशत हिस्से में जंगल था, जो 2017 में 13.5 प्रतिशत हिस्से में रह गया है। यानी जिले के कुल क्षेत्रफल का आधा प्रतिशत हिस्सा जंगल से समतल जमीन में बदल गया।


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