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कुपोषित बच्चों के वार्ड में पलंग के ऊपर के पिलर में दरार, छत से गिर रहा प्लास्टर

जिला अस्पताल के पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) में तंदुरुस्त होने के लिए आने वाले बच्चे और उनके माता-पिता पर संकट...

Bhaskar News Network | Last Modified - Aug 05, 2018, 03:50 AM IST

  • कुपोषित बच्चों के वार्ड में पलंग के ऊपर के पिलर में दरार, छत से गिर रहा प्लास्टर
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    जिला अस्पताल के पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) में तंदुरुस्त होने के लिए आने वाले बच्चे और उनके माता-पिता पर संकट मंडरा रहा है। वार्ड में लगे पलंगों के ऊपर पिलर में दरार आ गई है। गेट पर भी छत का प्लास्टर गिर रहा है।

    पोषण पुनर्वास केंद्र का वार्ड कुल 20 पलंगों का है। शनिवार को यहां 17 बच्चे भर्ती थे। पांच पलंग एक पिलर के आसपास लगे हैं। दीवार और छत से बारिश के पानी के लगातार रिसाव से इस पिलर में बड़ी दरार आ गई है। किसी भी समय प्लास्टर गिरने का खतरा बना हुआ है। शनिवार को पिलर के आसपास के पलंग खाली थे लेकिन जब बच्चे अधिक होते हैं, तो इन पलंगों पर उन्हें भर्ती करना ही पड़ता है। यही नहीं, वार्ड के गेट पर भी छत का प्लास्टर गिर रहा है।

    वार्ड के गेट की छत का प्लास्टर (बड़ा हिस्सा) चार दिन पहले ही गिरा था। गनीमत रही कि उस समय बच्चे या उनके माता-पिता नीचे नहीं थे। आम दिनों में यहां बच्चे खेलते रहते हैं और माता-पिता भी पास ही बैठे रहते हैं। हालातों की जानकारी होने के बाद भी सिविल सर्जन ने पिछले एक साल से सुध नहीं ली है।

    पिलर और उखड़ते प्लास्टर के बारे में लोक निर्माण विभाग काे अवगत कराया गया है। उनके एसडीओ कुछ दिन पहले ही निरीक्षण करके गए हैं। जल्द मरम्मत हो जाएगी। आरआे भी रिपेयर करवा देते हैं। जितेंद्र बामनिया, आरएमओ जिला अस्पताल झाबुआ

    जिला अस्पताल में दीवारों पर दरार हो गई है और छत का प्लास्टर उखड़ रहा है।

    7 दिन चला आरओ, बच्चों को उबाल कर पिला रहे पानी

    केंद्र पर आरओ सिस्टम भी बंद पड़ा हुआ है। तीन महीने पहले प्रभारी मंत्री का दौरा होने वाला था तो आरओ सिस्टम चालू करवा दिया गया। सुधारने के सात दिन के भीतर ही आरओ बंद हो गया। तब से केंद्र पर भर्ती होने वाले बच्चों को पानी उबालने के बाद छान कर पिलाया जा रहा है।

    हादसा हुआ तो बिगड़ेगी छवि

    कुपोषण जिले में खतरनाक स्थिति में है। इसका उदाहरण हाल ही में काकनवानी में जुड़वा बेटे-बेटी की मौत के रूप में सामने आ चुका है। ज्यादातर केस में कुपोषित बच्चों को पोषण पुनर्वास केंद्र तक लाने में बहुत मुश्किल होती है। कोई हादसा हो गया तो सारी मेहनत पर पानी फिरने का अंदेशा है।

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