किसानाें से नरवाई न जलाने की अपील
धार | उप संचालक किसान कल्याण ने अवगत कराया कि गेहूं काटने के बाद बचे हुए अवशेष (खापा/डूठ/डंठल) जलाना खेती के लिए आत्मघाती कदम सिद्ध हो सकता है। इससे अन्य खेतों में अग्नि दुर्घटना की संभावना रहती है किन्तु मिट्टी की उर्वरकता
पर भी विपरीत असर पड़ता है। इसके साथ ही धुएं से कार्बन डाय-आक्साइड से तापक्रम बढ़ता है अाैर प्रदूषण में वृद्धि भी होती है। उन्होंने किसानों से अपील की है कि वे किसी भी स्थिति में नरवाई न जलाएं। उर्वरक परत लगभग 6 इंच की उपरी सतह पर ही होती है, इसमें तरह-तरह जीवाणु उपस्थित रहते हैं। जो खेती को कई तरीके से लाभ पहुंचाते हैं। नरवाई जलाने से जमीन धीरे-धीरे बंजरता की ओर बढ़ने लगती है।