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मांदल पर थिरके, खरीदी की... और जी अपनी संस्कृति

एक वर्ष पहले
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भगोरिया पर्व के आखिरी दौर में रविवार को झाबुआ का मेला लगा। दोपहर 12 बजे से गांवों से लोग आना शुरू हुए और धीरे-धीरे मेला ग्राउंड, बस स्टैंड, बाजार लोगों से खचाखच भर गया। उत्कृष्ट स्कूल मैदान में झूले, दुकानें और लोग ही दिख रहे थे। यहां जाने की सड़क पर भी पैर रखने की जगह नहीं थी। अपनी-अपनी ताकत दिखाने कांग्रेस और भाजपा ने गेर निकाली। हालांकि कांग्रेस की गेर काफी बड़ी थी। 150 से ज्यादा ढोल के साथ गेर निकली। इसमें कई सारे नेता बाहर से भी पहुंचे।

परंपरागत ड्रेस में इस बार कम ही लोग दिखे। आधुनिकता और शहरीकरण का असर ज्यादा दिखा। कम ही महिलाएं ऐसी थी, जो पूरी तरह से चांदी के आभूषणों से लदी थी। ज्यादातर ग्रामीण बाजार में खरीदी करने, मेले में झूला झूलने आए। युवतियां परंपरागत ड्रेस की बजाय सलवार-सूट, जींस-टी शर्ट या लहंगे में थी, जो ग्रुप मांदल के साथ नाचते-गाते आए थे, वो महिलाएं जरूर पूरी तरह से आदिवासी वेशभूषा में थी।

दोनों दलों की गेर

{कांग्रेस कार्यालय से कांग्रेस की गेर निकली। इसमें विधायक कांतिलाल भूरिया के अलावा मीनाक्षी नटराजन भी शामिल हुई। डॉ. विक्रांत भूरिया, डॉ. आनंद राय, जोबट विधायक कलावती भूरिया, प्रकाश रांका सहित इंदौर, भोपाल से कई दूसरे मेहमान पहुंचे। गेर बस स्टैंड पर पहुंचकर खत्म हुई।

{ भाजपा की गेर दिलीप क्लब मैदान से कांग्रेस की गेर के बाद शुरू हुई। इसमें पूर्व विधायक शांतिलाल बिलवाल, जिलाध्यक्ष ओमप्रकाश शर्मा, भूपेश सिंगोड़, बबलू सकलेचा सहित दूसरे नेता शामिल हुए।

भगोरिया के दौरान खींचे भील जनजाति के फोटो का 1981 में जारी हुआ था डाक टिकट, जर्मनी की फोटो मैगजीन ने भी दी थी जगह

विख्यात फोटोग्राफर आनंदीलाल पारीख के बेटे कृष्णा ने भास्कर को उपलब्ध कराए फोटाे और डाक टिकट

भगोरिया का आज आखिरी दिन है। सोमवार को झाबुआ और आलीराजपुर में लगभग 8 जगह ये मेले लगेंगे। इन दिनों भगोरिया की ब्रांडिंग को लेकर काफी बातें होती हैं। लेकिन ऐसा नहीं है कि ये अब हो रहा है। दशकों से ये कोशिशें चल रही हैं। दुनियाभर में ख्यात फोटोग्राफर रहे आनंदीलाल पारीख के भगोरिया के दौरान खींचे गए फोटो कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मैगजीन में छप चुके हैं। यहां की आदिवासी लाइफस्टाइल के उनके खींचे फोटो जर्मनी की फोटो मैगजीन में दुनियाभर के फोटो के साथ दो बार छप चुके हैं। साल 1981 में ट्राइबल कल्चर पर जारी किए चार डाक टिकट में से एक झाबुआ के भीलों को लेकर भी छपा। इसमें भगोरिया में खींचा गया फोटो छापा गया था।

आनंदीलाल पारीख के बेटे और खुद फोटोग्राफी करने वाले कृष्णा पारीख ने ये फोटो हमें उपलब्ध कराए। उन्होंने वो डाक टिकट भी बताए। बताया, तब यहां के पोस्ट मास्टर खुद पूरा ब्रोशर लेकर घर तक आए थे। पिता के फोटो को इतने बड़े लेवल पर जगह मिलना सम्मान का विषय है। परिवार ने जर्मनी की दोनों मैगजीन सहित राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मैगजीन संभालकर रखी है। कई लोग इन्हें देखने आते हैं। वो बताते हैं, कई विलक्षण फोटो हैं। जो परंपराएं अब देखने को नहीं मिलती। आने वाले समय में पिता के इन फोटोज की एक प्रदर्शनी लगाने पर काम कर रहे हैं। कई सारी रोल हैं, लेकिन अब ब्लैक एंड व्हाइट प्रिंट का पेपर नहीं मिल रहा। इसके लिए दूसरे देशों में संपर्क किया है। वो मिल जाए तो कंपोज खुद ही करके प्रदर्शनी लगाएंगे।

150 से ज्यादा ढोल के साथ निकली गेर

भगाेरिया का अाज अाखिरी दिन, झाबुअा-अालीराजपुर में 8 जगह लगेंगे मेले

भागाेरिया देखने अाए लाेगाें ने भी पहने पारंपरिक परिधान।

गांवों से नाचते-गाते पहुंची युवतियां।

मेले में इस तरह एक जैसे परिधानों में पहुंची युवतियां।

साल 1981 में भील जनजाति को लेकर छपा डाक टिकट।

फोटो वाले डाक टिकट और मैगजीन में छपे फोटो दिखाते कृष्णा पारीख।

ड्रोन फोटो | अंकित जैन
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