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पहले हर साल नई लकड़ियों से बनाते थे गल का मचान, अब सीमेंट-कांक्रीट के बनने लगे
आदिवासी समाज आज मनाएगा गल पर्व, मन्नतधारी गल घूमेंगे, देंगे बलि
धुलेंडी के दिन आदिवासी समाज गल पर्व मनाएगा। इसमें मन्नधारी कई फीट ऊंचे मचान पर बंधी लकड़ी के सहारे गल घूमेंगे। ये मचान आमतौर पर लकड़ी की बल्लियों के बने होते हैं, लेकिन अब कई जगह सीमेंट-कांक्रीट के स्थायी मचान बन चुके हैं। कालीदेवी के पास छापरी गांव में सरकारी मदद से ऐसा ही मचान कुछ साल पहले बना है। जिले में कई जगह ये बने हैं, लेकिन एक समय ऐसा था, जब आदिवासी हर साल नया मचान बनाते थे। वो भी 30 से 50 फीट तक ऊंचा। इसके लिए हर साल नई लकड़ियाें की व्यवस्था की जाती थी। कई दिन ये मचान बनाने में लगते थे।
पहले हर गांव में दर्जनों लोग गल घूमने की मन्नत लेते थे। वो सफेद या लाल संग की खास वेशभूषा में गल के लिए पहुंचते थे। गल का मचान बल्लियों से बनता था। ऊपरी सिरे पर घूमने वाली लकड़ी लगती थी। मन्नतधारी को इस पर बांधकर तेजी से घुमाया जाता था। उसके घूमते ही नीचे खड़े लोग बकरे की बलि देते थे। अभी भी होता बहुत कुछ ऐसा ही है, लेकिन मन्नतधारियों की संख्या कम हो गई, मचान की ऊंचाई कम हो गई और मचान का स्वरूप बदल गया। पक्के मचान बन गए और जहां लकड़ी के हैं, वो भी हर साल नए नहीं बनाए जाते। दरअसल अब इतनी लंबी लकड़ी के तने आसानी से नहीं मिल पाते। इन्हें काटने पर रोक भी है।
50 साल पुराना दृश्य : ब्लैक एंड व्हाइट फोटो लगभग 50 साल पुराना है। इसे मशहूर फोटोग्राफर आनंदीलाल पारीक ने खींचा था। इसमें बुजुर्ग सीढ़ियों पर और मचान पर दिख रहे हैं। एक मन्नतधारी युवा गल घूम रहा है।
50 साल पहले
50 साल पहले ऐसे होता था गल, हर साल नए मचान बनाए जाते थे
अब गांवों में सीमेंट-कांक्रीट के गल मचान बन रहे हैं।