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चातुर्मासिक पक्खी और संतों का संयोग श्री संघ की पुण्यवानी है : दिलीपमुनिजी

एक वर्ष पहले
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पेटलावद | प्रतिक्रमण विभाव से स्वभाव में आने की साधना है। चातुर्मासिक पक्खी और संतों का संयोग श्री संघ की पुण्यवानी है। जो इस दिन को तप, आराधना के साथ मना लेगा उसके कई भवों के कर्मक्षय हो जाएंगे और साधक आत्मा अपने लक्ष्य मोक्ष के करीब पहुंच जाएगा। उक्त प्रेरक उद्गार बात संत दिलीपमुनिजी ने चार्तुमासिक पक्खी पर्व पर आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए स्थानक भवन पेटलावद में कही। उन्हांेने कहा आज हमें और हम सभी को भूतकाल के पापों का खेद प्रकट करना है। वर्तमान में पापों के भावों को नहीं आने देना है। भविष्य में आत्मा में धर्म टिका रहे इसके लिए पाप नहीं करने, कर्म बंधन नहीं होने देने के लिए प्रतिज्ञाबद्ध होना है। दिलीपमुनिजी ने कहा संसार (भोग) संसार का मार्ग और आध्यात्म मार्ग 36 के आंकड़े की तरह है। संसार मार्ग अंतहीन है तो आध्यात्म का मार्ग जन्म मरण से मुक्ति दिलाकर शाश्वत मोक्ष पर समाप्त होने वाला है।

धर्मसभा में जयंतमुनि ने कहा जबान को शुगर फैक्ट्री, दिमाग को आईस फैक्ट्री की तरह चलाना है तभी शांति का उत्पादन होगा। आज कई श्रावक-श्राविकाओं ने परिपूर्ण व देश पोषध के साथ संवर, उपवास, बेला, एकाशना आदि की तपस्या की। आसपास के कई संघों से श्रावक-श्राविकाओं ने आकर लाभ लिया। रविवार को बच्चों का धार्मिक शिविर आयोजित किया गया। जिसमें करीब 35 बच्चों ने भाग लिया।
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