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पवन पुत्र को मानते हो तो वायु में मत घोलो विष: शास्त्री

यदि आप पवनपुत्र हनुमानजी को मानते हैं तो वायु में विष न घोलें। हमारे परिवेश का पर्यावरण तभी शुद्ध रहेगा जब आसपास...

Dainik Bhaskar

May 18, 2018, 04:50 AM IST
पवन पुत्र को मानते हो तो वायु में मत घोलो विष: शास्त्री
यदि आप पवनपुत्र हनुमानजी को मानते हैं तो वायु में विष न घोलें। हमारे परिवेश का पर्यावरण तभी शुद्ध रहेगा जब आसपास हरियाली होगी। हनुमानजी पवन पुत्र होने के कारण वायु के देवता हैं। जब आप पर्यावरण का सरंक्षण करेंगे तो वीर हनुमान आपसे सदैव प्रसन्न रहेंगे। यह संदेश रतीराम का पुरा गांव में चल रही भागवत कथा के चौथे दिन पंडित देवदत्त शास्त्री श्रद्धालुओं को दे रहे थे।

शास्त्रीजी ने प्रवचन में बताया कि हनुमानजी ने हमेशा अपनी लीलाओं में प्रकृति प्रेम को प्रदर्शित किया है। कभी वे भागवान राम के भाई लक्ष्मण को बचने के लिए पहाड़ों से संजीवनी बूटी लेकर आए, तो कभी उन्होंने समुद्र में पत्थरों पर राम लिखकर से तू बनाने में भूमिका निभाई। भागवताचार्य के मुताबिक मनुष्य की सांसें तभी तक चलेंगी जब तक पृथ्वी पर जल के साथ हरियाली रहे। पर्यावरण सरंक्षण के बगैर मानव जीवन संभव नहीं है। चोरों ओर हरियाली रहने से मानव सुखी व सम्पन्न होगा।

कैलारस में हुई ध्रुव चरित्र की कथा: कैलारस की चंबल कॉलोनी में भागवत कथा के दूसरे दिन यानि गुरुवार को कपिलो व्याख्यान हुए, वहीं वृंदावन धाम से पधारे भागवताचार्य सतीश चंद्र शास्त्री ने ध्रुव चरित्र की कथा का वर्णन किया। ध्रुव कथा का वर्णन करते हुए शास्त्रीजी ने बताया कि एक बार राजा उत्तानपाद सुरुचि के पुत्र उत्तम को गोद में बैठाकर प्यार करने लगे। उसी समय बालक ध्रुव वहां आ गया। और उन्होंने अपने पिता की गोद में बैठने की इच्छा व्यक्त की। तभी घमंडी से भरी सुरुचि ने कठोर शब्दों में ध्रुव से कहा बच्चे तू राजसिंहासन पर बैठने का अधिकारी नहीं है। क्योंकि तू राजा का बेटा तो है, लेकिन तूने मेरी कोख से जन्म नहीं लिया। अगर तुझे पिता की गोद में बैठना है तथा राजसिंहासन की इच्छा है तो भगवान श्रीनारायण की तपस्या-आराधना कर उनकी कृपा से मेरे गर्भ में आकर जन्म ले। मेरी कोख से जन्म लेने के बाद ही तू पिता की गोद में बैठना। तब पिता को छोड़कर ध्रुव रोते हुए अपनी मां सुनीति के पास पहुंचे और उन्हें पूरी बात बताई।

पोरसा की जौंटई पंचायत के रावतपुरा गांव में चल रह है कथा: कथा चैतन्य ग्रंथ है। कुछ व्यक्ति अभाव में जीते हैं तो कुछ भगवान भक्ति में समय गुजारना पसंद करते हैं। संसार स्वार्थ का समुंदर है तो रामकथा परमार्थ का सागर है। रामकथा सुनने से मनुष्य के हृदय में श्रद्धा व विश्वास का सृजन होता है। यह उपदेश गुरुवार को जौंटई पंचायत के रावतपुरा गांव में चल रही भागवत कथा में वृंदावन धाम से पधारे कथा वाचक आचार्य श्रीरामगोविंद श्रद्धालुओं को सुना रहे थे। भगवताचार्य ने कहा कि पृथ्वी पर जब-जब अनाचार एवं अत्याचार बढ़ता है तब-तब भगवान अवतरित होते आए हैं।

कैलारस, पोरसा व अंबाह में चल रही है भागवत कथा

अंबाह मेंं कथा सुनते श्रद्धालु।

पोरसा में कथा सुनाते हुए आचार्य।

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