--Advertisement--

शिक्षा का मामला हो तो पैरेंटिंग डिसिप्लीन अमल में लाएं

एक चीज पूरे भारत में बहुत आम है, लेकिन गैर-मेट्रो क्षेत्रों में कुछ ज्यादा ही- बेटे के लिए तो अपने रिहायशी इलाके का...

Danik Bhaskar | Mar 04, 2018, 02:55 AM IST
एक चीज पूरे भारत में बहुत आम है, लेकिन गैर-मेट्रो क्षेत्रों में कुछ ज्यादा ही- बेटे के लिए तो अपने रिहायशी इलाके का सर्वश्रेष्ठ स्कूल चुनना, जबकि बेटियों के लिए सबसे कम प्राथमिकता वाला स्कूल न भी चुने तो दूसरे और तीसरे क्रम का स्कूल चुना जाता है। जब भी मैं कोशिश करके पालकों के इस भेदभावजनक व्यवहार का उनसे औचित्य पूछता हूं तो वे प्रश्न की अनदेखी कर देते या इन शब्दों में उसे खारिज कर देते हैं, ‘वह क्या करेगी पढ़कर?’ स्कूल के दस साल और यदि बेटी को आगे पढ़ने दिया गया तो कॉलेज के पांच वर्षों में व्यवहार संबंध लाखों भेदभाव सहित बेटी की शिक्षा को लेकर यह बुनियादी ‘फैमिली पॉलिसी’ का फर्क परिवार को गहरा आघात पहुंचाता है।

यही वजह है कि मुझे देहरादून के उस ऑटो ड्राइवर और उसकी बेटी के प्रति समानरूप से सम्मान का भाव पैदा हुआ। दूसरों की तुलना में 2018 की होली अशोक तोडी के परिवार के लिए 24 घंटे पहले ही आ गई, जब इस बुधवार उत्तराखंड प्रॉविंशियल सिविल सर्विसेस (ज्यूडिशियल) 2016 के नतीजे घोषित किए गए। इसमें उनकी बेटी पूनम तोडी ने टॉप किया और अब वह जज बनने ही वाली है।

ऐसी बात नहीं कि पूनम को नाकामी का सामना नहीं करना पड़ा। सच तो यह है कि उसे तीसरे प्रयास में सफलता मिली। पिछले दो प्रयासों में उसने लिखित परीक्षा तो पास कर ली पर इंटरव्यू में सफल नहीं हो सकी। इन परीक्षाओं को पास करने के अलावा उसे सतत प्रयास करते रहने के लिए सराहा जाना चाहिए। उसी तरह उसके पिता की भी प्रशंसा करनी होगी कि उन्होंने अपने किसी बच्चे की शिक्षा पर कमजोर आर्थिक परिस्थितियों का साया नहीं पड़ने दिया।

हालांकि ऐसा कोई सर्वे तो नहीं है पर आप और मैं तत्काल सहमत हो जाएंगे कि ऑटो ड्राइवर भी नाकामियों का सामना करते हैं। वे कुछ पैसा घर ले जाने का सपना देखते हैं और मन में ही परिवार की कठिनाइयों से पार पाने का हिसाब लगाते हैं।अचानक यातायात का कोई सिपाही जुर्माना ठोंक देता है अथवा रिश्वत मांग लेता है। चूंकि वे अपने पूरे वर्किंग टाइम में पुलिस वालों और सड़कों पर मौजूद रहते हैं तो व्यवस्थागत विसंगतियों का शिकार होने का उनका जोखिम और बढ़ जाता है। अपनी आमदनी को घटनाओं के किसी अनपेक्षित मोड़ के कारण खो देना उनके पेशे में बहुत आम है। यह हताशा लेकर घर जाना और प|ी व बच्चों के साथ खराब व्यवहार करना भी इन लोगों के लिए उतना ही आम है।

अशोक की मामूली और कम-ज्यादा होते रहने वाली आमदनी के बावजूद उन्होंने अपने बच्चों की शिक्षा में भारी निवेश किया और धैर्यपूर्वक उसके परिणाम का इंतजार किया। पूनम ने खुद बताया कि उसके पालकों ने कभी उस पर परिवार की आमदनी में हाथ बंटाने के लिए काम करने का दबाव नहीं डाला, जो आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों में बहुत आम है। मजे की बात है कि पूनम के घर वालों ने हमेशा उसे और आगे पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया और इसीलिए तो वह एमकॉम और कानून की डिग्रियां हासिल कर सकीं। आप ही हिसाब लगाइए कि इतना पढ़ने के लिए कितने वर्ष लगे होंगे। पूनम वहीं नहीं रुकी। इस हफ्ते रिजल्ट आने से पहले ही वह एलएलएम में प्रवेश ले चुकी थी।

हालांकि, उसने कॉमर्स की छात्रा के रूप में शुरुआत की थी लेकिन, समाज को किसी तरह से योगदान देने की गहरी इच्छा का परिणाम यह हुआ कि फिर वह कानून की पढ़ाई की ओर चली गई। गरीब परिवार की होने के कारण वह जानती थी कि शिक्षा से न सिर्फ उसके परिवार की आर्थिक स्थिति सुधरेगी बल्कि न्याय देने की भूमिका में वह समाज को योगदान भी दे सकेगी।

अशोक और पूनम की ज़िद के कारण आखिरकार परिवार को अच्छी खबर मिली। वह परिवार तो इन सारे वर्षों में ऑटो ड्राइवर का परिवार कहा जाता था, उम्मीद है कि उसे भविष्य में ‘जज मेडम का फैमिली’ कहा जाएगा। सामाजिक दर्जे में यह उन्नति आसानी से नहीं आती। पैसे से भी ज्यादा यह मामला आत्म-अनुशासन और उसे व्यवहार में लाने से है। यह कुछ जमीनी नियमों, पारिवारिक मूल्यों और बच्चों के पालन-पोषण की कुछ विधियों के कड़े पालन का नतीजा है।

फंडा यह है कि यदि आप शिक्षा में परवरिश संबंधी कुछ अनुशासन लागू करें तो इसका बहुत अधिक फायदा मिलता है।

मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन की आवाज में मोबाइल पर सुनने के लिए टाइप करें FUNDA और SMS भेजें 9200001164 पर

एन. रघुरामन

मैनेजमेंट गुरु

raghu@dbcorp.in