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संस्कार बचाने हैं तो बच्चों को संस्कृत पढ़ाना होगी

News - संस्कृत को छोड़ने के कारण बढ़ रहे तलाक, आत्महत्या, वृद्धाश्रम बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाकर पाप-पुण्य के संस्कार...

Dainik Bhaskar

Dec 11, 2017, 04:00 AM IST
संस्कार बचाने हैं तो बच्चों को संस्कृत पढ़ाना होगी
संस्कृत को छोड़ने के कारण बढ़ रहे तलाक, आत्महत्या, वृद्धाश्रम

बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाकर पाप-पुण्य के संस्कार दे पाना नामुमकिन

भास्कर संवाददाता | खंडवा

गौरीकुंज में रविवार दोपहर 12 बजे से संस्कृत सम्मेलन हुआ। इसमें सांस्कृ़तिक कार्यक्रमों के साथ ही संस्कृत की जरूरत और महत्व की जानकारी दी गई। मुख्य वक्ता संस्कृत भारतीय के राष्ट्रीय संगठन मंत्री दिनेश कामद ने कहा संस्कृति और संस्कार बचाने हैं तो बच्चों को संस्कृत पढ़ाना होगी। हमारे जो संस्कार हैं वे संस्कृत में हैं। इन्हें संस्कृत से ही सिखाया जा सकता है।

राष्ट्रीय संगठन मंत्री ने कहा जर्मनी, फ्रांस में अंग्रेजी नहीं चलती। उनकी अपनी बोलियां और भाषा है। हमारे यहां ऐसा नहीं है। सभी राज्यों की अपनी भाषाएं हैं। कोई पूछे कि भारत की भाषा क्या तो जवाब नहीं हैं। इसका बड़ा कारण यह कि हम अपनी भाषा को भुला चुके हैं। हमारी भाषा या भारत की भाषा संस्कृत है। हमारे यहां की सभी भाषाओं की वर्णमाला संस्कृत से ली गई है। सभी भाषाओं की मां संस्कृत है। हमारी भाषाओं से संस्कृत निकाल दो तो कुछ नहीं बचेगा। मौजूदा वक्त में हमारी हिंदी में अधिकांश शब्द अंग्रेजी के आ गए हैं। नई पीढ़ी के बच्चे फल, सब्जी, रंग दिनों के नाम हिंदी में नहीं जानते। यही कारण है कि हिंदी कमजोर हो रही है।

सोचते हैं हिंदी में, बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाते

हम सोचते हिंदी में हैं, बच्चों को पढ़ने के लिए अंग्रेजी स्कूल में भेजते हैं। यह प्रकृति के विरुद्ध है। हमारे घर का वातावरण हिंदी भाषी होता है। वे सोचते हिंदी में हैं। स्कूल जाते हैं तो उनका मस्तिष्क साथ नहीं देता। असहज लगता है। वे रोते हैं। मजबूरन स्कूल जाते हैं। वहां जाकर खुद की मानसिकता बदलनी पड़ती है। रोज संघर्ष होता है। मजबूरी में अंग्रेजी सीखने के साथ ही उसी तरह बन जाते हैं। अंग्रेजी सिखाने के बाद हम संस्कार पाप-पुण्य सिखाना चाहते हैं, जबकि अंग्रेजी में पाप-पुण्य के लिए शब्द ही नहीं हैं। वह संस्कार नहीं सीखेगा।

दिनेश कामद

सभी भारतीय नाम संस्कृत में

उन्होंने बताया सभी भारतीय नाम संस्कृत में हैं। हम संस्कृत नहीं जानेंगे तो कुछ नहीं जानेंगे। कितनी भी डिग्रियां ले लो, अनपढ़ ही रहेंगे। क्योंकि अपने नाम का अर्थ नहीं जान पाएंगे। भारत की पहचान संस्कृत है। भारतीयता की पहचान संस्कृत है। 5119 साल बाद भी संस्कृत में कृष्ण की गीता आकर्षित करती है।

सभी विवि में पढ़ाई जा रही संस्कृत

दुनिया के सभी विश्वविद्यालयों में संस्कृत पढ़ाई जा रही है। चीन, जापान, अमेरिका सहित सभी देशों में संस्कृत विषय है। हमारे यहां इसे दोयम दर्जे की भाषा बना दिया।

यह भी जानिए: संस्कृत पढ़ने, बोलने व सीखने से बढ़ती है स्मरण शक्ति





निगम से निकाली शोभायात्रा

सम्मेलन से पहले निगम के सामने से गौरीकुंज तक शोभायात्रा निकाली गई। सम्मेलन की शुरुआत में सीईओ वरदमूर्ति मिश्र ने संस्कृत का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि संस्कृत पढ़ने-बोलने से शरीर के कई रोग ठीक होते हैं। कार्यक्रम में अमरेश सिकरवार सहित अन्य लोग मौजूद रहे। कार्यक्रम में अनुष्का गढ़वाल व कृतिका ने श्रीराम चंद्र कृपालु भजमन... पर कत्थक किया। एमएलबी स्कूल की छात्राओं ने निर्भय भरत नाटक की प्रस्तुति दी।

सम्मेलन शुरू होने से पहले निगम से गौरीकुंज तक रैली निकाली गई। रैली में विद्यार्थी तख्तियां लेकर चले।

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