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आर्टिफिशियल लाइट सेहत का महिलाओं की सेहत पर बुरा असर

नए शोधों से पता चला है कि महिलाओं में देर रात तक नाईट शिफ्ट में काम करने के कारण उनमें मेलाटोनिन का स्तर घट जाता है...

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 04, 2018, 03:35 AM IST

आर्टिफिशियल लाइट सेहत का महिलाओं की सेहत पर बुरा असर
नए शोधों से पता चला है कि महिलाओं में देर रात तक नाईट शिफ्ट में काम करने के कारण उनमें मेलाटोनिन का स्तर घट जाता है और मेलाटोनिन नींद आने के लिए जरुरी होता है। तनाव और अनिद्रा लगातार होने के कारण भी शरीर की कार्यशैली प्रभावित होती है और कंसीव करने में दिक्कत आती है।

8 घंटे की नींद गर्भस्थ शिशु को

इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस से निकलने वाली नीली रोशनी का प्रेग्नेंट महिलाओं और उनके बच्चे पर भी बुरा असर पड़ता है। कम से कम 8 घंटे की अंधेरे में नींद भ्रूण के विकास के लिए बेहद जरूरी है। अगर भ्रूण को एक तय मात्रा में मां से मेलाटोनिन हार्मोन नहीं मिलता है तो बच्चे में कुछ रोगों जैसे एडीएचडी और ऑटिज्म की आशंका होती है। इसलिए यह बेहद जरूरी है कि आठ घंटे की नींद और हेल्दी डाइट ली जाए। हाई लेवल का कृत्रिम प्रकाश शाम के समय खासकर शिफ्ट बदलने के दौरान सबसे ज्यादा नींद को प्रभावित करता है। सुपराक्यासमेटिक न्यूक्लियस एससीएन दिमाग का वह हिस्सा है जो बॉडी क्लाक को नियंत्रित करता है। इसका पता ओसाका यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं समेत कई शोधार्थी भी लगा चुके हैं। यूसीएलए और जापान साइंस एंड टेक्नोलॉजी एजेंसी भी साबित कर चुकी है कि आर्टिफिशियल लाइट के कारण महिलाओं के पीरियड्स पर भी असर होता है।

मेलाटोनिन के संतुलन के लिए...

ऐसी रोशनी से महिला दूर रहे तो फर्टिलिटी और प्रेग्नेंसी के दौरान भ्रूण में बेहतर डेवलपमेंट के साथ सकारात्मक परिणाम सामने आते हैं। ऐसी महिलाएं जो कंसीव करना चाहती हैं वे कम से कम 8 घंटे की नींद जरूर लें और अंधेरे में ही सोएं ताकि मेलाटोनिन स्टीमुलेट हो और शरीर की बॉयोलॉजिकल क्लॉक न डिस्टर्ब हो।

हेल्थ

डॉ. तनु बत्रा

आई वी एफ एक्सपर्ट, जयपुर

नए शोधों से पता चला है कि महिलाओं में देर रात तक नाईट शिफ्ट में काम करने के कारण उनमें मेलाटोनिन का स्तर घट जाता है और मेलाटोनिन नींद आने के लिए जरुरी होता है। तनाव और अनिद्रा लगातार होने के कारण भी शरीर की कार्यशैली प्रभावित होती है और कंसीव करने में दिक्कत आती है।

8 घंटे की नींद गर्भस्थ शिशु को

इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस से निकलने वाली नीली रोशनी का प्रेग्नेंट महिलाओं और उनके बच्चे पर भी बुरा असर पड़ता है। कम से कम 8 घंटे की अंधेरे में नींद भ्रूण के विकास के लिए बेहद जरूरी है। अगर भ्रूण को एक तय मात्रा में मां से मेलाटोनिन हार्मोन नहीं मिलता है तो बच्चे में कुछ रोगों जैसे एडीएचडी और ऑटिज्म की आशंका होती है। इसलिए यह बेहद जरूरी है कि आठ घंटे की नींद और हेल्दी डाइट ली जाए। हाई लेवल का कृत्रिम प्रकाश शाम के समय खासकर शिफ्ट बदलने के दौरान सबसे ज्यादा नींद को प्रभावित करता है। सुपराक्यासमेटिक न्यूक्लियस एससीएन दिमाग का वह हिस्सा है जो बॉडी क्लाक को नियंत्रित करता है। इसका पता ओसाका यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं समेत कई शोधार्थी भी लगा चुके हैं। यूसीएलए और जापान साइंस एंड टेक्नोलॉजी एजेंसी भी साबित कर चुकी है कि आर्टिफिशियल लाइट के कारण महिलाओं के पीरियड्स पर भी असर होता है।

मेलाटोनिन के संतुलन के लिए...

ऐसी रोशनी से महिला दूर रहे तो फर्टिलिटी और प्रेग्नेंसी के दौरान भ्रूण में बेहतर डेवलपमेंट के साथ सकारात्मक परिणाम सामने आते हैं। ऐसी महिलाएं जो कंसीव करना चाहती हैं वे कम से कम 8 घंटे की नींद जरूर लें और अंधेरे में ही सोएं ताकि मेलाटोनिन स्टीमुलेट हो और शरीर की बॉयोलॉजिकल क्लॉक न डिस्टर्ब हो।

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