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कमीशन का खेल / दान, फिर अनुदान, बगैर कमीशन नहीं हाेता काम



Charges of taking commission on officers and babus in Women Child Development Department
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Charges of taking commission on officers and babus in Women Child Development Department

  • महिला बाल विकास विभाग में अधिकारियों व बाबुओं पर पहले भी लगे आरोप

Dainik Bhaskar

Nov 10, 2019, 12:28 PM IST

खंडवा. महिला बाल विकास विभाग में कमीशन दिए बगैर किसी का काम नहीं होता। कमीशन का खेल स्वयं सहायता समूह से शुरू होकर एनजीओ की अनुदान राशि निकालते तक चलता है। जिले में 1642 आंगनवाड़ी केंद्र है। इसमें शहरी क्षेत्र में 172 केंद्र संचालित हैं।

 

दो एनजीओ गरीब व अनाथ बच्चों व महिलाओं के लिए काम कर रहे हैं। जिले की आंगनवाड़ियाें में 1 लाख 35 हजार बच्चों की संख्या दर्ज है, लेकिन यह रोज नहीं आते। इन्हीं की कमियां निकालने के नाम पर स्वयं सहायता संचालक से 10-15 प्रतिशत कमीशन मांगने का खेल शुरू होता है। यह खेल विभाग प्रमुख की सहमति के बगैर नहीं चल सकता। ज्यादातर स्वयं सहायता समूह संचालक पढ़े-लिखे और जागरुक नहीं होने के कारण मंथली रिपोर्ट कार्यकर्ता द्वारा बनाई जाती है।


कार्यकर्ता पर पर्यवेक्षक का दबाव होता है। पर्यवेक्षक को 25-30 आंगनवाड़ियाें का प्रभारी दिया जाता है। पर्यवेक्षक के ऊपर परियोजना अधिकारी व इनके ऊपर जिला कार्यक्रम अधिकारी का दबाव होता है। राशि निकलने के बाद फिक्स कमीशन के हिसाब से नकद रुपए अधिकारियों तक पहुंचाए जाते हैं। इस तरह हर महीने लाखों रुपए का खेल होता है। कमीशन के इस खेल में विभाग के बाबू भी पीछे नहीं है। एनजीओ संचालकों ने पूर्व में भी जिला कार्यक्रम अधिकारी व बाबूओं पर कमीशन मांगने की शिकायत कलेक्टर से की थी, लेकिन अधिकतर मामले जांच में ही दबकर रह गए। क्योंकि ऊपर तक सेवा होती है।


अरोरा पर भी था दबाव
चिल्ड्रन्स होम की संचालक सिस्टम एमली से कमीशन की बात करने वाले अरोरा पर भी वरिष्ठ अधिकारियों का दबाव होने से उन्होंने कमीशन की बात की। जिसमें उन्होंने मैडम को भी लगेगा का हवाला दिया है। इसी आवाज के आधार पर वह फंस गए। वाइस रिकार्डिंग से स्पष्ट हो रहा है कि कमीशन की राशि अरोरा ने खुद के लिए नहीं मांगी। फिलहाल मामला जांच में चल रहा है।

 

कमीशन नहीं देने पर गलत रिपोर्ट बनाई जाती है
आंगनवाड़ी समय पर नहीं खुलना, बच्चों की संख्या व एनजीओ की लापरवाही सामने आने पर विभाग प्रमुख मौका चुकते नहीं है। संस्था प्रमुख को सीधे धमकी दी जाती है कि जांच रिपोर्ट में अनियमितताएं पाई गई है। रिपोर्ट ओके बनानी है या फिर खिलाफ में बनाए। कमीशन के बारे में खुली धमकी मिलने के बाद संचालक भी हां कर देते है। क्योंकि कई संस्थाएं तो कागजों पर ही चल रही है।

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