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धर्म... मनुष्य के लिए पाप करना तो सरल है, इसके परिणाम भोगना बहुत कठिन

Badwani News - जैन स्थानक में दिए अपने प्रवचन में जैन संत प्रकाशचंद्र म.सा. ने कहा- भास्कर संवाददाता | सेंधवा पाप कार्य करना...

Dainik Bhaskar

Dec 09, 2018, 04:50 AM IST
Sendhwa News - dharma it is easy to commit sin to man it is very difficult to accept the consequences
जैन स्थानक में दिए अपने प्रवचन में जैन संत प्रकाशचंद्र म.सा. ने कहा-

भास्कर संवाददाता | सेंधवा

पाप कार्य करना बहुत सरल है लेकिन पाप का परिणाम भोगना बहुत कठिन है क्योंकि पाप किसी का सगा नहीं और पुण्य कभी दगा देगा नहीं। किए हुए पाप कर्मों के फल को भोगे बिना छुटकारा मिलने वाला नहीं है। पाप कार्य को छोड़े बिना कल्याण होने वाला नहीं है। इसलिए पुण्यवाणी से जो हमें यह मनुष्य भव मिला है उसका सदुपयोग करें व पाप क्रिया से बचने का प्रयास करें।

जैन स्थानक में ये विचार प्रकाशचंद म.सा. के सुशिष्य अमृतमुनि म.सा. ने व्यक्त किए। सामान्य रूप से हम लोगों की धारणा यह होती है कि किसने देखा पाप का परिणाम और पुण्य का फल लेकिन सहज रूप में हम देखे तो यह बात हम समझ सकते हैं कि एक बालक जन्म लेते ही बीमार होता है और एक बालक स्वस्थ जन्म लेता है। एक जीव मनुष्य योनि को प्राप्त करता है, तो एक जीव तिर्यचं योनि अर्थात बेल, बकरी, मुर्गी आदि रूप में जन्म लेता है। तो यह सब क्या है। हमारे किए हुए कर्म ही हमें सुख और दुख देने वाले हैं। इसलिए धर्म के मर्म को समझकर हम ऐसे कर्म करें जिससे दूसरे जीव को तकलीफ न हो। आपने कहा कि धर्म के चार द्वार बताए गए हैं। प्रथम क्षमा अर्थात क्रोध रहित जीवन, दूसरा व्यसन मुक्त जीवन, तीसरा नीति युक्त जीवन, चौथा नमृता सहित जीवन। ज्ञानी बताते हैं 4 कारणों से हमारे विद्यमान गुणों का नाश होता है। जिसमें प्रथम क्रोध दूसरा दूसरों की प्रतिष्ठा से जलन करने से अर्थात ईर्ष्या व द्वेष भावना रखने से तीसरा उपकारी का उपकार न मानने से और चौथा मिथ्यात्व का सेवन करने से। इसमें क्रोध यदि हमारे जीवन में है तो ना तो हमें इस भव में शांति मिलने वाली है और ना आने वाले भवों में। क्रोध हमें दुर्गति में ही ले जाने वाला है यह क्रोध विष के समान है जो हमें दुख ही देने वाला है। जितना हमारे जीवन में हम क्रोध से दूर रहकर क्षमा भाव को धारण करेंगे, उतने ही शांत और सुखी बनेंगे। आपने कहा कि दूसरों की पद-प्रतिष्ठा को देखकर हम जलन की भावना रखते हैं और उनकी टांग खींचने का प्रयास करते हैं तो ये ईर्ष्या भावना से भी हमारे विद्यमान सद्गुणों का नाश होता है। दूसरों के प्रति ईर्ष्या और जलन की भावना रखने से सामने वाले का नुकसान होगा कि नहीं यह तो उसके कर्म जाने पर ऐसा करके हम स्वयं के बुरे कर्मों का बंध अवश्य कर लेंगे। धर्मसभा में शिवराज सुराणा, बीएल जैन, ओमप्रकाश गोयल, श्याम गोयल, किशन गोयल, घेवरचंद्र बुरड, नंदलाल बुरड, राजेंद्र कांकरिया, छोटेलाल जोगड़, दिलीप सुराणा, डाॅ. एमके जैन, पिंटू सकलेचा, डाॅ. अश्विन जैन, विवेक सुराणा सहित बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित थे।

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