चांद सा गुरु, बादलों जैसे शिष्य

Khandwa News - ओशो मेडिटेशन रिज़ाॅर्ट, पुणे आषाढ़ के महीने में जब चांद दिखाई भी नहीं देता, बादलों से घिरा रहता है तब चांद को पूजने...

Bhaskar News Network

Jul 14, 2019, 09:00 AM IST
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ओशो मेडिटेशन रिज़ाॅर्ट, पुणे

आषाढ़ के महीने में जब चांद दिखाई भी नहीं देता, बादलों से घिरा रहता है तब चांद को पूजने के लिए कहा गया है क्योंकि सदगुरु को खोजना आसान नहीं है, वह कोई शरद ॠतु का चांद नहीं है जो निर्मल आकाश में चमक रहा हो। वह तो अंधेरे में, घने बादलों की ओट में ही रहेगा। उसे खोजना ही शिष्य की परीक्षा है। जो काले बादलों को देखकर ही लौट आए उसे शिष्य बनने का अधिकार नहीं है। उसके पास वह आंख ही नहीं है जो गुरु तत्व को पहचान सके।

गुरु पूर्णिमा के प्रतीक को ओशो काव्यात्म शैली में समझाते हैं ‘तुम आषाढ़ की तरह हो, अंधेरे बादल हो। तुम्हारे अंधेरे से घिरे हृदय में रोशनी पहुंचानी है। इसलिए पूर्णिमा। चांद जब पूरा हो जाता है, तब उसकी एक शीतलता है। चांद को ही हमने गुरु के लिए चुना है। सूरज को चुन सकते थे, ज्यादा मौजूं होता। क्योंकि चांद के पास अपनी रोशनी नहीं है। चांद की सारी रोशनी उधार की है। सूरज के पास अपनी रोशनी है। जैसे कि तुम दीए को आईने के पास रख दो, तो आईने में से भी रोशनी आने लगती है। चांद तो केवल दर्पण का काम करता है, रोशनी सूरज की है। गुरु दर्पण है परमात्मा का। गुरु जो दे रहा है वह उसका अपना नहीं है, उसका स्रोत कहीं और है।

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भारत ही ऐसा देश है जहां आषाढ़ के महीने में पूर्णिमा के दिन गुरु को पूजा जाता है। इसमें आध्यात्म तो है ही, काव्य भी है...

आषाढ़ के महीने में जब चांद दिखाई भी नहीं देता, बादलों से घिरा रहता है तब चांद को पूजने के लिए कहा गया है क्योंकि सदगुरु को खोजना आसान नहीं है, वह कोई शरद ॠतु का चांद नहीं है जो निर्मल आकाश में चमक रहा हो। वह तो अंधेरे में, घने बादलों की ओट में ही रहेगा। उसे खोजना ही शिष्य की परीक्षा है। जो काले बादलों को देखकर ही लौट आए उसे शिष्य बनने का अधिकार नहीं है। उसके पास वह आंख ही नहीं है जो गुरु तत्व को पहचान सके।

गुरु पूर्णिमा के प्रतीक को ओशो काव्यात्म शैली में समझाते हैं ‘तुम आषाढ़ की तरह हो, अंधेरे बादल हो। तुम्हारे अंधेरे से घिरे हृदय में रोशनी पहुंचानी है। इसलिए पूर्णिमा। चांद जब पूरा हो जाता है, तब उसकी एक शीतलता है। चांद को ही हमने गुरु के लिए चुना है। सूरज को चुन सकते थे, ज्यादा मौजूं होता। क्योंकि चांद के पास अपनी रोशनी नहीं है। चांद की सारी रोशनी उधार की है। सूरज के पास अपनी रोशनी है। जैसे कि तुम दीए को आईने के पास रख दो, तो आईने में से भी रोशनी आने लगती है। चांद तो केवल दर्पण का काम करता है, रोशनी सूरज की है। गुरु दर्पण है परमात्मा का। गुरु जो दे रहा है वह उसका अपना नहीं है, उसका स्रोत कहीं और है।

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