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कर्त्तव्य, सेवा और समर्पण का दूसरा नाम ही नारी है

2 वर्ष पहले
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सेंट्रल रेलवे भुसावल मंडल के खंडवा रेलवे स्टेशन पर चार महिला डिप्टी स्टेशन सुप्रींटेंडेंट तैनात हैं। डे-नाइट ड्यूटी में सबसे महत्वपूर्ण सिस्टम कंट्रोल रूम पर महिलाएं ट्रेनों/मालगाडिय़ों का संचालन करती हैं। 24 घंटे में खंडवा स्टेशन से 100 से 110 ट्रेन व मालगाड़ियां निकलती हैं।

प्रमुख बात यह कि रूट-रिले इंटर लॉकिंग रूम नियंत्रण कक्ष के सबसे महत्वपूर्ण सिस्टम कंट्रोल रूम पर खंडवा की बेटी भी नियुक्त है। गुरुवार को सुबह 8 से शाम 4 बजे की शिफ्ट में माता चौक निवासी सोनिया पाल अपने सहयोगी राजलक्ष्मी के साथ ड्यूटी कर रही थीं। डिप्टी स्टेशन सुप्रींटेंडेंट पाल ने बताया मेरे पिता राधेश्याम पाल किसान है। मां कांता पाल गृहिणी है। मैंने अपनी पढ़ाई का पूरा खर्च ट्यूशन पढ़ाकर उठाया। इंजीनियरिंग कॉलेज से इलेक्ट्रानिक्स एवं कम्युनिकेशन कोर्स से इंजीनियर सोनिया की खंडवा स्टेशन पर जुलाई-2018 में नियुक्ति हुई।

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 बेटियां ऐसी ही होती हैं 
जंक्शन पर 4 महिला डिप्टी एसएस, 110 ट्रेनों का करती हैं संचालन
सेंट्रल रेलवे भुसावल मंडल के खंडवा रेलवे स्टेशन पर चार महिला डिप्टी स्टेशन सुप्रींटेंडेंट की तैनाती है।

त्याग और बलिदान का दूसरा नाम है नारी। उसके बिना जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती। बात घरेलू मोर्चे की हो या फिर बाहरी दुनिया की। हर मोर्चे पर महिलाओं ने सफलता के झंडे गाड़े हैं। मां बनकर बच्चों को सही दिशा दिखाई तो प|ी बनकर पति की सफलता में हाथ बंटाया। इसलिए कहते भी है कि हर पुरुष की सफलता के पीछे महिला का हाथ होता है। महिला दिवस पर ऐसी ही नारियों को सलाम है, जो दूसरों के लिए भी प्रेरणा बनकर उभरी हैं। इसलिए आज सबसे पहले संघर्ष कर आगे बढ़ने वाली महिलाओं की तीन प्रेरक कहानियां -

सेंट्रल रेलवे को ही ड्यूटी के लिए चुना

वहीं सोनिया के साथ ड्यूटी कर रही बीए पास बिहार निवासी डिप्टी एसएस राजलक्ष्मी ने बताया एसएससी के साथ रेलवे की परीक्षा की तैयारी कर रही थीं। रेलवे में सिलेक्ट होने पर अक्टूबर-2018 में खंडवा में नियुक्ति हुई। जमालपुर जिला मुंगेर बिहार निवासी राजलक्ष्मी बताया सेंट्रल रेलवे को ही ड्यूटी के लिए चुना। पैनल पर इटारसी निवासी स्वर्णिमा चौधरी और प्रियंका श्रीवास्तव की भी ड्यूटी रहती है।

डिप्टी एसएस सोनिया पाल

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 सिस्टर की अनोखी समाजसेवा 
समाजसेवा के लिए बनी नन, वकील बनकर करेंगी गरीबों की मदद
महिलाएं बोल नहीं पाती, इसलिए सच सामने नहीं आता, मैं उनकी आवाज बनना चाहती हूं, उनके साथ खड़े रहना है।

भास्कर संवाददाता | खंडवा

महिलाएं बोल नहीं पाती, इसलिए सच सामने नहीं आता, मैं उनकी आवाज बनना चाहती हूं। लोगों की सेवा करना ही जिंदगी का मकसद है। नन (सिस्टर) की उपाधि लेने से पहले तीन मन्नत ली है, जिंदगीभर कुंवारी रहूंगी, अाज्ञाकारी बनूंगी, गरीब रहूंगी। यह कहानी है सिस्टर जाेयसी की। मजलूमों की सेवा के लिए अब वकालत की पढ़ाई कर रही हैं। शहर से 30 किमी दूर ग्राम बिलनखेड़ी के ज्योति निवास कान्वेंट में अपनी वरिष्ठ सिस्टर बिंसी व शीबा के साथ रहकर सामाजिक कार्य कर रही है।

अधिकारियों के सामने जाने से लगता था डर...

पांच साल पहले हुई एक घटना के बारे में जाेयसी बताती है गांव की महिलाओं से कहा परेशानी हो तो बताना। फिर क्या था दूसरे ही दिन गांव की 20-25 महिलाएं आ गईं। उन्होंने कहा सिस्टर गांव में पानी के लिए महिलाओं को बहुत परेशान होना पड़ता है। दूसरे ही दिन जनसुनवाई में महिलाओं के साथ पहुंच गई। अपनी बात रखी एक सप्ताह भी नहीं हुआ और गांव में बोरिंग हो गया। महिलाओं ने बोरिंग का पहला पानी मुझे पिलाया। इस घटना से कुछ अधिकारियों ने मुझे डराने की भी कोशिश की लेकिन मेरे कदम नहीं डगमगाए।

समाजसेवा ही मकसद: जोयसी ने कहा वकालत की पढ़ाई पूरी होने के बाद स्थानीय न्यायालय में ही प्रेक्टिस करना चाहती है। जरूरतमंद महिलाओं की मदद करना चाहती हूं। इस दौरान मेरी कोई फीस नहीं रहेंगी।

समाजसेवी जाेयसी

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 मां के रूप में पहली गुरु 
बेटे की हडि्डयां टूटती हैं, इसलिए स्कूल में भी साथ बैठती है यह मां
भारती ने कहा बेटा तुषार जब तक अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर लेता ऐसे ही उसके साथ स्कूल से घर तक आती जाती रहेंगी।

भास्कर संवाददाता | खंडवा

जन्म से हड्डियां टूटने व जुड़ जाने की बीमारी से पीड़ित 11 साल के बेटे को मां कभी ममता से दुलार करती है तो कभी दोस्त बनकर साथ खेलती है, बेटा चल नहीं पाता तो उसे गाेद में उठाकर स्कूल तक ले जाती है। यहां पांच घंटे साथ बैठकर उसके साथ पढ़ती भी है।

यह कहानी है मोघट थाना क्षेत्र निवासी भारती पति राजेश गांगले (40) की। राजेश और भारती का बेटा तुषार गांगले (11) का है लेकिन वह जन्म से ही हड्डियां टूटने व जुड़ने वाली बीमारी आस्थोजेनेसिस इंफेक्टा से ग्रसित है। राजेश ने बताया तुषार के पैदा होने के बाद तीन साल तक तो वह बिस्तर पर ही रहा। फिर उसका दाखिला बोरगांव स्थित गांव बलरामपुर के शासकीय स्कूल में करवा दिया। एक साल बाद वे उसे लेकर खंडवा आए और शासकीय मेन हिंदी स्कूल में कक्षा दूसरी में दाखिला करवा दिया।

सब अाश्चर्य से देखते थे हमें

सुबह खाना बनाने से लेकर घर का सारा काम करना, फिर दोपहर 12 बजे से शाम 5 बजे तक उसके साथ स्कूल में ही बैठकर उसे पढ़ने में मदद करना। सीमा बताती हैं कि शुरुआत में बच्चों के साथ स्कूल में बैठना अटपटा लगता था, जो पैरेंट्स आते हैं वह मुझे शिक्षिका समझ लेते हैं, फिर बताने पर आश्चर्य भरी निगाहों से देखने लगते हैं। वह बताती है बेटा तुषार अब 5वीं कक्षा की परीक्षा दे रहा है। वह जब तक अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर लेता ऐसे ही उसके साथ स्कूल से घर तक आती जाती रहेंगी।

तुषार के साथ मां भारती।

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