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लाभचंद छाजेड़ का संथारा, डोल यात्रा में शामिल हुईं महिलाएं

एक वर्ष पहले
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नगर के जैन समाज के समाजसेवी लाभचंद छाजेड़ का संथारा के बाद रविवार रात में निधन हो गया। निधन की खबर से समाज व नगर में शोक छा गया। लाभचंद छाजेड़ कई महीनों से अस्वस्थ थे। उनका इंदौर के एक निजी अस्पताल में इलाज चल रहा था। इलाज के दौरान ही उन्होंने अपनी इच्छा से शांत क्रांति संघ के आचार्य पूज्य विजयराज के आज्ञानुवर्ती प्रज्ञा र| पूज्य जितेश मुनि, विद्वान पूज्य धैर्य मुनि, तपस्वी र| पूज्य विश्वास मुनि के मुखारबिंद से अहोभाव से संथारा ग्रहण किया था।

इंदौर में इलाज के दौरान रविवार रात 9.45 बजे छाजेड को करही घर लाया गया। जहां पर पूरे परिवार के साथ धर्म का श्रवण करते हुए उन्होंने रात 10.30 बजे अंतिम सांस ली।

सोमवार सुबह 11 बजे निवास स्थान वर्धमान काॅलोनी से अंतिम डोल यात्रा निकाली गई। जो मुख्य मार्ग होते हुए आखीपुरा मुक्ति धाम पर पहुंची। डोल यात्रा में पुरुषों के साथ ही समाज की महिलाएं भी बड़ी संख्या में शामिल हुई। इस दौरान समाजजनों ने जय जय कार जय जय कार संथारे की जय जय कार भगवान महावीर स्वामी के जय कारे भी लगाए। मुक्ति धाम पर लाभचंद छाजेड को बेटे विशाल, बेटी वर्षा, बहू निधि, पोता वेदांत व पोती स्वरा ने मुखाग्नि दी। इस दौरान श्री संघ अध्यक्ष शिखरचंद छाजेड़, समाजसेवी प्रकाशचंद छाजेड़, ताराचंद छाजेड, विनोद छाजेड, सुरेश छाजेड, वीरचंद छाजेड, अशोक जैन, सुशील डाकोलिया, लोकेंद्र छाजेड़ सहित अन्य समाजजनों ने श्रद्धांजलि अर्पित की।

संथारे के बाद निकाली अंतिम डोल यात्रा में शामिल समाजजन व अन्य।

मुखाग्नि देते परिजन।

यह होता है संथारा

मृत्यु को निकट जानकर अपनाये जाने वाली एक जैन प्रथा है। इसमें जब व्यक्ति को लगता है कि वह मौत के करीब है तो वह खुद खाना पीना त्याग देता है। दिगंबर जैन शास्त्र अनुसार समाधि या सल्लेखना कहा जाता है। इसे ही श्वेतांबर साधना पद्धति में संथारा कहा जाता है।
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