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बेटी एक नहीं दो कुलों को तारती है : पं. त्रिवेदी

आज के मानव को एक विचार करना होगा कि उसे परिवार के साथ रहना है या रुपए के साथ। आज का मानव पैसा कमाने की लालसा में इतना...

Dainik Bhaskar

May 09, 2018, 03:20 AM IST
बेटी एक नहीं दो कुलों को तारती है : पं. त्रिवेदी
आज के मानव को एक विचार करना होगा कि उसे परिवार के साथ रहना है या रुपए के साथ। आज का मानव पैसा कमाने की लालसा में इतना खो चुका है कि उसे पैसे के अलावा कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है। पैसे के चक्कर मे मानव सुख, चैन, भजन कीर्तन, परिवार आदि से दिन प्रतिदिन दूर होता जा रहा है। आज के समय में भाई-भाई के बीच सिर्फ लेने का विवाद है लेकिन भगवान श्रीराम एवं भरतजी के बीच देने का विवाद था। यह बात नगर के सुतार मोहल्ले में संकट मोचन हनुमान मंदिर समिति द्वारा आयोजित रात्रिकालीन श्रीराम कथा महोत्सव के आठवें दिन सोमवार को पं. संजयकृष्ण त्रिवेदी कांटाफोड़ (देवास) ने श्रद्धालुओं से कही।

पं. त्रिवेदी ने आगे कहा भगवान श्रीराम और भरतजी की अंततः दिव्य चर्चा के बाद श्रीराम जी ने निर्णय भरत पर छोड़ा और कहा कि भरत आप यह बताओ कि अपने पिताजी को वचन प्रिय थे या प्राण तब भरतजी ने कहा कि अपने पिताजी को प्राण नहीं वचन प्रिय थे। फिर भगवान श्रीराम की बातों का अर्थ समझकर भरत श्रीराम के चरणों में गिर गए और निवेदन किया कि भाई मैं आपके बिना नहीं जी पाऊंगा। मुझे कुछ तो आधार दीजिए तब श्रीराम जी ने अपनी चरण पादुका भरत को दी। भरतजी उस पादुका को अपने सिर पर धारण कर अयोध्या आए और राज सिंहासन पर पादुका स्थापित की तब से संसार में राम राज्य स्थापित हुआ। पं. ने आगे कहा आज के समय में प्रत्येक भाई को भगवान श्रीराम और भरतजी के इस चरित्र से शिक्षित होकर इस मार्ग का अनुसरण करना चाहिए। गुरुजी ने भगवान श्रीराम को समुद्र और सभी मानवों को नदियों की संज्ञा दी। जिस प्रकार सभी नदियां समुद्र में जाकर मिलती है। उसी तरह मानव को भी श्रीराम के चरणों मे जाना चाहिए। बेटी एक नहीं दो कुलों को तारती है।

व्यासपीठ का पूजन मुख्य यजमान के साथ ही समिति सदस्य विजय मुलेवा, मणिलाल गेहलोत, नरेंद्र सेप्टा, रमेश पाटीदार, नारायण पाटीदार, राजेश अगल्चा, सुनील सिद्ध आदि ने किया। महाआरती एवं महाप्रसादी के लाभार्थी जयंतीलाल सेप्टा थे।

नगर के सुतार मोहल्ले में संकट मोचन हनुमान मंदिर समिति ने आयोजित की रात्रिकालीन श्रीराम कथा

कुक्षी. श्रीराम कथा को संबोधित करते पं. त्रिवेदी।

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