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संत नहीं बन सकते तो संतोषी बन जाओ

भागवत कथा अच्छे संस्कारों में निखार लाती है। सत्संग करने से सद्गति मिलती है। सत्संग ही जीवन को निर्मल बनाकर जीवन...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 01, 2018, 03:00 AM IST

संत नहीं बन सकते तो संतोषी बन जाओ
भागवत कथा अच्छे संस्कारों में निखार लाती है। सत्संग करने से सद्गति मिलती है। सत्संग ही जीवन को निर्मल बनाकर जीवन में निखार लाते है। भागवत कथा सुनने मात्र से ही जन्मों-जन्मों के पाप पुण्य में बदल जाते है। मनुष्य यदि संत नहीं सकता है तो संतोषी बन जाए। यह बात मांडू घाट के नीचे ग्राम बालीपुर बुजुर्ग में चल रही सात दिवसीय श्रीमद् संगीतमय भागवत कथा का समापन पर शनिवार को कथावाचक पं. निर्मल इंदुलकर ने श्रद्धालुओं से कही। आयोजक समिति ने कथावाचक का स्वागत पुष्पमाला और शाॅल श्रीफल व स्मृति चिह्न भेंट कर किया। मनावर विधायक रंजना बघेल भी कथा सुनने पहुंची। महाआरती के बाद भंडारा हुआ।

कथा के सातवें दिन कथावाचक पं. इंदुलकर ने श्रीकृष्ण एवं सखा सुदामा के चरित्र का वर्णन किया। मित्रता के बारे में बताते हुए कहा कि सुदामा के आने की खबर पाकर किस प्रकार श्रीकृष्ण दौड़ते हुए दरवाजे तक गए थे। कृष्ण अपने बाल सखा सुदामा की आवभगत में इतने विभोर हो गए कि द्वारका के नाथ हाथ जोड़कर और अंग लिपटाकर जल भरे नेत्रों से सुदामा का हाल चाल पूछने लगे। मित्रता में धन दौलत आड़े नहीं आती। ‘स्व दामा यस्य स: सुदामा’ अर्थात अपनी इंद्रियों का दमन कर ले वही सुदामा है। सुदामा चरित्र की कथा सुनाते हुए कहा मनुष्य स्वयं को भगवान बनाने के बजाय प्रभु का दास बनने का प्रयास करे क्योंकि भक्ति भाव देख कर जब प्रभु में वात्सल्य जागता है तो वे सब कुछ छोड़ कर अपने भक्त के पास दौड़े चले आते है। गृहस्थ जीवन में मनुष्य तनाव में जीता है जबकि संत सद्भाव में जीता है। यदि संत नहीं बन सकते तो संतोषी बन जाओ। संतोष सबसे बड़ा धन है। सुदामा की मित्रता भगवान के साथ नि:स्वार्थ थी उन्होंने कभी उनसे सुख साधन या आर्थिक लाभ प्राप्त करने की कामना नहीं की। लेकिन सुदामा की प|ी द्वारा पोटली में भेजे गए चावलों ने भगवान श्रीकृष्ण से सारी हकीकत कह दी और प्रभु ने बिन मांगे ही सुदामा को सबकुछ दे दिया। भागवत कथा के समापन पर श्रद्धालुओं से बुराइयों का त्याग करने का संकल्प दिलाया। विधायक बघेल भी भागवत की पूजा अर्चना की। टवलाई सरपंच मनोज रावत सहित श्रद्धालु शामिल हुए। महाअारती के बाद भागवत सेवा समिति बालीपुर बुजुर्ग ने भंडारे का आयोजन किया।



गांव बालीपुर बुजुर्ग में चल रही भागवत कथा के समापन पर पं. इंदुलकर ने कहा

मांडू. कथा समापन पर श्रद्धालुओं ने पंडित का सम्मान किया।

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