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सरकारी प्रयासों से कृषि क्षेत्रों में बड़ी मात्रा में सुधार की संभावना

गुजरात चुनाव के बाद विचलित हुई केंद्र सरकार भारतीय कृषि का गौरव लौटाने के लिए कार्य करने लगी है। यह गौरव वर्ष 2022 तक...

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 04, 2018, 03:05 AM IST

गुजरात चुनाव के बाद विचलित हुई केंद्र सरकार भारतीय कृषि का गौरव लौटाने के लिए कार्य करने लगी है। यह गौरव वर्ष 2022 तक लौटाने का लक्ष्य रखा है। इन्हें प्राप्त करने के लिए सभी उपाय किए जाएंगे। कृषि क्षेत्र में सुधार के लिए जरूरी कानून बनाने और आय में वृद्धि की जाएगी। व्यापारी वर्ग स्टॉक में रूचि नहीं ले रहे हैं। इस वजह से भी भर सीजन में फसलें मंडियों में कम भाव पर बिकती है। किसानों की पहली पसंद ऋण माफी है। किंतु इसे खुले रूप से स्वीकार नहीं किया जा रहा है। वास्तव में उत्पादन कैसे बढ़े और लागत घटे इस फार्मूले पर कार्य किया जाए तो ऋण माफी जैसी योजनाओं पर विचार करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। नीति आयोग एमएसपी पर खरीदी या भावांतर योजना को लागू करने पर इस माह विचार कर सकता है।

80 अरब का प्रावधान

चुनाव की वैतरणी पार करने के लिए कुछ राज्य किसानों को लुभाने के लिए अनेक प्रयास कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि किसानों की अपेक्षाएं अपार हैं। उन्हें पूरा करना न केवल राज्य सरकार के बस की बात है, वरन केंद्र सरकार के बस में भी नहीं है। केवल पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने करीब 69 से 70 हजार करोड़ के ऋण माफ किए थे। उसका पार्टी को लाभ भी मिला था। वर्तमान में मप्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान और कर्नाटक में विधानसभाओं के चुनाव हैं। किसानों को आकर्षित करने के लिए अनेक तरह की घोषणाएं की जा रही हैं। राजस्थान में किसानों ने केवल राज्य की सहकारी संस्थाओं से कर्ज लिया हो। उन्हें माफी दी जा सकती हैं कर्ज में 80 अरब रुपए का प्रावधान किया गया है, जबकि संसद में दी गई जानकारी के अनुसार वर्ष 2016-17 में 743 करोड़ का कर्ज लिया है। कुल कर्ज का पांचवें हिस्से का कर्ज राज्य की वाणिज्यिक सहकारी संस्थाओं ने दिया है। दो तिहाई कर्ज वाणिज्यिक बैंकों ने दिया है। यह कर्ज ऋण माफी के दायरे में नहीं आते हैं।

स्टॉक में लाभ नहीं

मप्र और राजस्थान में उठ रहे किसान आंदोलन की जड़ में जाना चाहिए। आखिर मप्र के मंदसौर क्षेत्र सड़कों पर क्यों उतरे। एक माह तक उग्र आंदोलन क्यों चला। मप्र में किसान आंदोलन थमा नहीं है। पिछले दिनों देश के कुछ बड़े राजनेता इसमें भाग ले चुके हैं। राजस्थान में आंदोलन चल ही रहा है। वास्तव में नोटबंदी के बाद देश की पूरी आर्थिक व्यवस्था गड़बड़ा गई है, जिसका सीधा प्रभाव किसानों को उनकी उपज पर पड़ा है। एक तरफ कृषि का उत्पादन बढ़ गया और दूसरी ओर मांग ठप पड़ गई।रुपए की कमी से स्टॉकिस्ट बाहर हो गए। इसी वजह से बाजार से लेवाल गायब हो गए। नोटबंदी के बाद स्टॉकिस्टों की पूंजी आधी रह गई। स्टॉकिस्टों को यह भी समझ में आ गया है कि स्टॉक करने में लाभ होने के बजाय घाटा ही अधिक होने वाला है। बाजारों में जब तेजी आती थी, तब स्टॉकिस्टों को लाभ होता था। अब शायद वह जमाना जाता रहा।

चार सूत्रीय फार्मूला

जब भी मंडियों में फसल आती थी, तेजी-मंदी की धारणा रखने वाले स्टॉकिस्ट खरीदी के लिए खड़े रहते थे। फसलें हाथों हाथ अच्छे भावों पर बिक जाया करती थी। नोटबंदी और जीएसटी प्रभावशील होने के बाद स्टॉकिस्ट बाहर हो गए। अब दैनिक खपत वाले खरीददार बाजार में रह गए हैं। दैनिक खरीद सीमित मात्रा में होती है, अत: कृषि जिंसों के भावों का टूटना स्वाभाविक है। असंतोष का प्रमुख कारण यही है किसानों की उपज बिकवाने के लिए पिछले दिनों दिल्ली में प्रधानमंत्री ने चार सूत्रीय फार्मूला दिया है। कृषि उपज की लागत घटाना, उपज का उचित मूल्य दिलाना, खलिहानों से बाजारों तक पहुंचाने में होने वाली हानि को बचाना, और अतिरिक्त आय के साधन तैयार करने जैसी योजनाएं पेश की गई है। भारत में सबसे बड़ी दिक्कत यह है किसान वर्ग मांग आधारित खेती पर जोर नहीं देते हैं। जिस जिंस के भाव इस वर्ष अधिक मिले दूसरे वर्ष उसी जिंस की बोवनी की भरमार कर देंगे। जैसा कि इस वर्ष मप्र में किसान प्याज की खेती में कर रहे हैं। अंतिम समय तक प्याज की बोवनी कर रहे हैं। अधिक उत्पादन करने के बाद लाभकारी मूल्य की आशा कैसे की जा सकती है।

प्लेटफार्म की योजना

दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों में किसानों को कौन-सी जिंस की बोवनी करना और उत्पादित फसल की बिक्री कब करना जैसी सूचनाएं विवि के कृषि विभाग दी जाती है। उत्तर भारत में ऐसी व्यवस्था नहीं है अब केंद्र सरकार किसानों को समय पर जानकारी मुहैया कराएगी। मांग आधारित खेती के प्रति उन्हें प्रोत्साहित करने की जरूरत महसूस की जा रही है। किसानों को प्रत्येक तरह की जानकारी मुहैया कराने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म तैयार करने की योजना ही कर्ज नहीं मिलने में छोटे किसानों की समस्या दूर करने को लेकर 63 हजार करोड़ सहकारी समितियों को कम्प्यूटरीकरण का कार्य भी तेजी से पूरा किया जा रहा है। केंद्र सरकार का प्रयास है कि परंपरागत खेती के साथ-साथ अतिरिक्त आय के साधन सृजित करने होंगे। इसके अलावा ग्रामीण मंडियों को विकसित करने के बारे में योजना बनाई गई है।

दो योजनाओं पर विचार

बैठक में संभव है मप्र की भावांतर योजना अथवा समर्थन भावों पर खरीदी करने जैसी योजना पर विचार किया जा सकता है। सरकार का उद्देश्य यही होगा कि किसानों को बाजार मूल्य और लागत मूल्य के अंतर की राशि की भरपाई करें। अंतर की राशि किसानों के सीधे खातों में डाली जा सके। बाजार की स्थिति चाहे जो हो सरकार का मानना है कि इस समय मक्का पर 36 प्रतिशत, कॉटन पर 22 से 30, सोयाबीन पर 43.8 मूंगफली पर 40.9 प्रतिशत कीमत लागत से मिल रही है। जिन्हें आगामी दिनों में बढ़ाकर 50 प्रतिशत या इससे अधिक करना है। सरकारी योजना यह भी है कि किसानों को समय पर जानकारी मुहैया कराना, मांग आधारित खेती के प्रति उन्हें प्रोत्साहित करने की जरूरत है।

23 फसलों पर समर्थन मूल्य

अभी तक सरकार देश के किसानों की फसल की लागत का डेढ़ गुना कीमत सुनिश्चित करने के लिए सरकार दो तरह के मॉडलों पर विचार करने की योजना बना रही है। इन योजनाओं के लिए राज्यों से राय मांगी जाने वाली है। बताया जाता है कि इन दो मॉडलों में से एक किसे चुनना उस पर विचार करने के लिए इसी माह नीति आयोग की बैठक हो सकती है। जिसमें वित्तमंत्री ने आम बजट में किसानों की फसल की लागत का डेढ़ गुना कीमत देने का ऐलान किया गया था। केंद्रीय कृषि मंत्रालय के अनुसार अभी 23 फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा की जाती है, जो करीब 80 प्रतिशत कृषि क्षेत्र में फसलें उगाई जाती हैं। इन फसलों में से गेहूं, बाजरा, उड़द सहित 10 फसलों का एमएसपी लागत के 50 प्रतिशत या इससे अधिक है। शेष 13 फसलों का एमएसपी 50 प्रतिशत से भी कम है लेकिन लागत से अधिक है। ऐसे में किसानों को लाभकारी कीमत देने को लेकर नीति आयोग गंभीर हो गया है।

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Web Title: सरकारी प्रयासों से कृषि क्षेत्रों में बड़ी मात्रा में सुधार की संभावना
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